महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 21 नवंबर 2025
अमेरिका की US-China Economic and Security Review Commission की वार्षिक रिपोर्ट ने भारत की सुरक्षा, विदेश नीति और राष्ट्रीय सम्मान पर सीधा हमला बोल दिया है। यह कोई साधारण रिपोर्ट नहीं—यह अमेरिकी कांग्रेस के अधीन एक अत्यंत प्रभावशाली समिति की 800 पन्नों की वार्षिक समीक्षा है, और इसके पृष्ठ 108 व 109 में लिखी बातें भारत के लिए न केवल अनुचित बल्कि अपमानजनक हैं। रिपोर्ट में अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले को ‘विद्रोही हमला (insurgent attack)’ जैसा शब्द देकर आतंकवाद की प्रकृति को कमतर दिखाया गया है। इससे भी गंभीर बात यह है कि इसमें भारत-पाकिस्तान के चार दिन के संघर्ष को ऐसे पेश किया गया है जैसे उसमें “पाकिस्तान की सैन्य सफलता” हुई हो। यह न केवल तथ्यों का तोड़-मरोड़ है बल्कि भारत की सुरक्षा एजेंसियों, सैनिकों और देश की सामरिक क्षमता का अपमान है।
चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले महीनों में 60 बार सार्वजनिक रूप से “ऑपरेशन सिंदूर” को रोकने का श्रेय ले चुके हैं—और हर बार भारत सरकार की ओर से कोई सीधा खंडन, आपत्ति, या आधिकारिक विरोध सामने नहीं आया। अब जब US-China कमीशन की इस रिपोर्ट ने भारत की संप्रभुता और आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई को गलत तरीके से चित्रित किया है, तब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्रालय दोनों ही खामोश हैं। यह चुप्पी अब सवालों को और तीखा बना रही है।
यह भी सवाल उठ रहा है कि अमेरिका की इस कमिटी को ऑपरेशन सिंदूर पर ब्रीफ कौन कर रहा है? भारत सरकार ने इस ऑपरेशन पर बयान दिए, संसद में जानकारी दी, प्रतिनिधिमंडल सीमा क्षेत्रों का दौरा कर आया—तो फिर इतनी गलत, भारत-विरोधी और एकतरफा रिपोर्ट कैसे बनाई गई? क्या अमेरिकी एजेंसियों तक भारत की सही और तथ्यपूर्ण जानकारी नहीं पहुंची? या फिर भारत की विदेश नीति और कूटनीतिक संवाद में कोई बड़ी चूक हुई है? यह बात देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर भारत सरकार न तो विरोध जता रही है, न स्पष्टीकरण मांग रही है, और न ही अमेरिका के साथ कोई औपचारिक आपत्ति दर्ज कर रही है।
आज भारत की अपेक्षा यह है कि प्रधानमंत्री खुलकर बोलें, विरोध जताएँ और इस रिपोर्ट को आधिकारिक रूप से खारिज करें। लेकिन प्रधानमंत्री की यह रहस्यमयी चुप्पी न केवल असहज कर रही है बल्कि विदेश नीति की बड़ी विफलता के संकेत भी दे रही है। सरकार की प्रतिक्रिया न आने से यह प्रश्न और गहरा हो रहा है—क्या भारत इतनी गंभीर टिप्पणी को सहन कर लेगा? क्या हम अपनी सुरक्षा, अपनी लड़ाई और अपने सैनिकों के सम्मान से जुड़े मुद्दों पर भी मौन रहेंगे? देश अब जवाब चाहता है—और तुरंत चाहता है।




