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ओपिनियन | नेहरू पेपर्स और RSS–BJP की राजनीति: शब्दों की बाज़ीगरी, झूठ पड़ोसने की नीति

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एबीसी डेस्क | 17 दिसंबर 2025

नेहरू पेपर्स को लेकर उठा मौजूदा विवाद दरअसल काग़ज़ों का नहीं, बल्कि राजनीतिक ईमानदारी और नैरेटिव कंट्रोल का है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह RSS–BJP ने पहले “दस्तावेज़ गायब” होने का शोर मचाया और फिर संसद व आधिकारिक बयानों के ज़रिये उसी दावे से पीछे हटते हुए भाषा बदली, उसने इस पूरे प्रकरण को एक गंभीर ऐतिहासिक बहस के बजाय राजनीतिक ड्रामे में बदल दिया है। यही वजह है कि सवाल अब यह नहीं रह गया कि दस्तावेज़ कहां हैं, बल्कि यह बन गया है कि देश को गुमराह क्यों किया गया।

तथ्यों पर नज़र डालें तो 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के लिखित जवाब ने साफ़ कर दिया कि प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) की किसी भी जांच में जवाहरलाल नेहरू से जुड़े दस्तावेज़ “मिसिंग” नहीं पाए गए। यह जवाब अपने आप में उन तमाम राजनीतिक बयानों पर पानी फेर देता है, जिनमें पहले यह दावा किया गया था कि नेहरू के काग़ज़ात रहस्यमय तरीके से गायब हो गए हैं। इसके बाद 17 दिसंबर को मंत्रालय ने यह कहकर स्थिति “स्पष्ट” करने की कोशिश की कि दस्तावेज़ मिसिंग नहीं हैं, क्योंकि उनका ठिकाना पता है—वे 2008 में औपचारिक प्रक्रिया के तहत वापस लिए गए थे।

यहीं से ओपिनियन का असली प्रश्न पैदा होता है। अगर दस्तावेज़ों का ठिकाना शुरू से ज्ञात था, अगर रिकॉर्ड और कैटलॉग में सब दर्ज था, तो फिर “गायब” शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया? क्या यह महज़ शब्दों की भूल थी, या फिर जानबूझकर ऐसा नैरेटिव गढ़ा गया ताकि एक राजनीतिक हमला खड़ा किया जा सके? राजनीति में शब्द मासूम नहीं होते। “मिसिंग” कहना और फिर बाद में “मिसिंग नहीं हैं” कहना, केवल शब्दावली का सुधार नहीं, बल्कि कहानी को पीछे से आगे की ओर मोड़ने जैसा है।

सरकार अब यह तर्क दे रही है कि ये दस्तावेज़ राष्ट्रीय धरोहर हैं और उन्हें सार्वजनिक अभिलेखागार में होना चाहिए। यह तर्क अपने आप में बहस योग्य है और इस पर गंभीर, संस्थागत चर्चा होनी चाहिए। लेकिन समस्या यह है कि इस वैध बहस को शुरू करने से पहले ही RSS–BJP ने आरोपों का शोर खड़ा कर दिया। पहले सनसनी, फिर स्पष्टीकरण—यह वही पैटर्न है जो हाल के वर्षों में कई ऐतिहासिक और संवैधानिक मुद्दों पर अपनाया गया है। इससे भरोसा नहीं बनता, बल्कि यह संदेश जाता है कि राजनीतिक लाभ पहले है, तथ्य बाद में।

कांग्रेस का पक्ष इस संदर्भ में सीधा है—न तो कोई दस्तावेज़ गायब हुआ, न कोई चोरी हुई। अगर 2008 में औपचारिक प्रक्रिया के तहत कुछ निजी काग़ज़ वापस लिए गए थे, तो उस समय और उसके बाद भी संस्थागत स्तर पर बातचीत का रास्ता खुला था। सवाल यह है कि उसे अचानक 2025 में एक राजनीतिक हथियार क्यों बनाया गया। कांग्रेस का यह कहना गलत नहीं कि यह विवाद इतिहास की रक्षा से ज़्यादा, इतिहास के राजनीतिक उपयोग की कोशिश बनता जा रहा है।

असली मुद्दा—और जिस पर देश को बहस करनी चाहिए—यह है कि ऐतिहासिक दस्तावेज़ों की श्रेणी, सार्वजनिक पहुंच और संरक्षण की नीति क्या होनी चाहिए। यह काम संसद, आर्काइव विशेषज्ञों और इतिहासकारों के ज़रिये होना चाहिए, न कि टीवी डिबेट और सोशल मीडिया अभियानों के ज़रिये। लेकिन जब सत्ता पक्ष पहले आरोप उछालता है और बाद में शब्द सुधारता है, तो यह भरोसा कमजोर करता है कि मंशा वास्तव में पारदर्शिता की है।

नेहरू पेपर्स विवाद हमें एक बार फिर यह याद दिलाता है कि इतिहास को शोर से नहीं, सच्चाई से संभाला जाता है। दस्तावेज़ सुरक्षित हैं—यह अब आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया जा चुका है। इसके बाद भी अगर कहानी बार-बार बदली जा रही है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल यह कह देने से नहीं आती कि “हम सच चाहते हैं”, बल्कि यह दिखाने से आती है कि सच को तोड़ा-मरोड़ा नहीं जा रहा। और यही कसौटी है, जिस पर इस पूरे प्रकरण में RSS–BJP की राजनीति कटघरे में खड़ी नज़र आती है।

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