नई दिल्ली 23 सितंबर 2025
सरकार ने सभी विभागों को दीपावली गिफ्ट पर खर्च रोकने के आदेश जारी कर दिए — आधिकारिक तर्क है “सार्वजनिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग।” लेकिन आलोचक और कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह मास्कस्वरूप है: वहीं सरकार बड़े पैमाने पर हज़ारों नहीं, बल्कि लाखों करोड़ के फालतू प्रोजेक्ट और कपोलकल्पित व्यय कर रहेगी, और सीधे तौर पर कर्मचारियों के छोटे-छोटे हक़-ओ-फलाह पर बट्टा लगाकर अपनी आराखियाँ पलीता लगा देगी। यही वजह है कि हेडलाइन को न्यायसंगत ठहराने के लिए कहना गलत नहीं होगा — आदेश भी है और उसके पीछे की सच्चाई भी।
केंद्र सरकार ने हाल ही में सभी मंत्रालयों और विभागों को निर्देश दिए कि इस दीपावली किसी भी तरह के गिफ्ट या उपहार पर सार्वजनिक पैसा व्यय न किया जाए। आधिकारिक कारण दिया गया है कि करदाताओं के पैसों का “judicious use” सुनिश्चित किया जाना चाहिए। पर यही वही शब्दावली है जिसका उपयोग तब होता है जब असल में जनता के पैसे से अशर्फियां लुटाई जाएँ और गिन्नियों पर ही कोहराम मचा दिया जाए — बड़े-बड़े खर्च छिपाने के लिए।
सरकार के निर्देशों का स्वागत कर रहे उदारवादी बयान वहाँ तक सीमित हैं जहाँ तक दलील देना सुविधाजनक है। हकीकत यह है कि केंद्र सरकार उनमें से कुछ बड़े प्रोजेक्टों पर इस साल भारी मज़दूरी, ठेका और प्रचार-प्रसार पर ही अरबों-खरबों खर्च करने की योजना पहले से पक्की कर चुकी है। आलोचक कहते हैं कि ये खर्च सीधे-सीधे “हाथी के दांत — खाने के अलग, दिखाने के अलग” वाली नीति के अनुरूप हैं: जनता को बताया जा रहा है कि बचत हो रही है, जबकि पीछे बड़े बिल और गुप्त एमओयू के जरिए पैसे बहाए जा रहे हैं।
कर्मी वर्ग और कर्मचारी-संघों का कहना है कि यही आदेश असल में कर्मचारियों के छोटे-छोटे हक़ों पर कटौती का प्रीटेक्स्ट है। दीपावली पर पारंपरिक वेज व क्रिसमस बोनस और छुट्टियों के प्रावधानों में “नियत” कटौती के संकेत पहले ही मिल चुके हैं — अब विभागों से कहा जाएगा कि “गिफ्ट पर खर्च न करें, लेकिन बोनस/भत्तों पर भी निजीकरण/संशोधन पर विचार करिए।” अर्थशास्त्री और श्रमिक नेता यह तर्क दे रहे हैं कि यह कदम सीधे तौर पर कर्मचारियों की कमर तोड़ने और सरकारी वादे काटने की तैयारी है।
राजनीतिक हलकों में भी असंतोष तेज है। विपक्ष का आरोप है कि यह एक दोहरा मापदंड है: जहां अनाज, ईंधन सब्सिडी और बड़े कॉर्पोरेट-समझौतों पर करोड़ों-खरबों खर्च करने के “विकल्प” खुलकर अपनाए जा रहे हैं, वहीं साधारण सरकारी कर्मचारी और मध्यम वर्ग को सिमटने के लिए कहा जा रहा है। “अशर्फियां लुटाए जाओ और गिन्नियों पर कोहराम”— यह वाक्यांश अब सड़कों पर, सोशल मीडिया पर और अफसरवाहियों की बैठकों में गूंज रहा है।
सरकारी जवानी यह भी कि विभागीय आदेश केवल “गिफ्ट” रोकने के लिए हैं — पर अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जब बड़े स्तर पर फंडिंग और व्यय-पैकेज तय हो चुके हों, तब छोटे-छोटे सार्वजनिक-स्तर के खुशमिजाज संकेतों को बंद करके आमदनी की बचत दिखाना खतरनाक सूचनात्मक छलावा है। नतीजा यह होगा कि पीठ पीछे किए जाने वाले बड़े निवेश और विशेष खर्चों की जो सूची पहले थी, वह अब और कम पारदर्शी तरीके से लागू होगी — और जनता के पैसे का असली उपयोग छिपा रहेगा।
कर्मचारियों का गुस्सा बढ़ रहा है। सैकड़ों कर्मचारी यूनियनों ने मिलकर चेतावनी जारी की है कि अगर बोनस, भत्ते और पारंपरिक अधिकारों पर छेड़छाड़ हुई तो वे संगठित हड़ताल और प्रदर्शन के लिए निकलेंगे। उनके अनुसार, दीपावली गिफ्ट पर रोक का असल मकसद लोकल इश्यूज को तुगलकी ढंग से दबाना है ताकि बड़े पैमाने पर होने वाले व्ययों पर सवाल न उठे।
विशेषज्ञों की राय — क्या सरकार वाकई मुनासिब बचत कर रही है?
नीति विश्लेषक कहते हैं कि अगर सचमुच “जुडीशियस यूज़” मकसद है तो पहले बड़े परियोजनाओं और सरकारी-नीति-शेड्यूल की पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए।
अगर आदेश केवल दिखावा है, तो इससे जनता का भरोसा और घटेगा और कर्मचारियों में असंतोष जग जाएगा।
अर्थशास्त्री आगाह कर रहे हैं कि छोटे व्ययों पर पाबंदी और बड़े व्ययों पर छूट का संयोजन अर्थव्यवस्था के सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकता है।
आदेश का ढांचा तो बचत की बात करता है, पर सच्चाई यह है कि पैसों की दिशा वही रहेगी — सिर्फ गिनती बदल जाएगी। गरीब और मध्यम वर्ग के कर्मचारी, जो गिफ्ट और बोनस के छोटे-छोटे हिस्सों पर निर्भर होते हैं, उन्हीं के हक़ों पर बट्टा पड़ा दिखेगा, जबकि बड़े सौदों की अशर्फियों का प्रवाह जारी रहेगा। अगर सरकार सचमुच जनता के पैसों के प्रति जवाबदेह है तो उसे बड़े खर्चों की पूरी सूची सार्वजनिक करनी चाहिए — वरना यह कदम सिर्फ तिकड़म और दिखावे का हिस्सा साबित होगा।




