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वैश्विक कीमतों में उछाल के बीच नेपाल ने भारत से आपातकालीन उर्वरक आयात का लिया सहारा, मानसून से पहले संकट गहराया

अंतरराष्ट्रीय/व्यापार / नेपाल | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 5 मई 2026

उर्वरक संकट के बीच भारत की ओर झुका नेपाल

वैश्विक स्तर पर बढ़ती कीमतों और आपूर्ति में बाधा के बीच नेपाल ने कृषि क्षेत्र को बचाने के लिए भारत से आपातकालीन उर्वरक आयात का फैसला लिया है। नेपाल सरकार ने कृषि सामग्री कंपनी को भारत से 80,000 टन रासायनिक उर्वरक खरीदने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। यह खरीद सरकार-से-सरकार (G2G) समझौते के तहत की जाएगी, जो 2022 में दोनों देशों के बीच हुआ था।

क्या-क्या खरीदेगा नेपाल

इस आपातकालीन आयात में 60,000 टन यूरिया और 20,000 टन डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) शामिल है। हालांकि नेपाल ने पहले 1.5 लाख टन उर्वरक की मांग की थी, लेकिन फिलहाल 80,000 टन पर सहमति बनी है। अधिकारियों का कहना है कि कैबिनेट की अंतिम मंजूरी के बाद आयात प्रक्रिया तुरंत शुरू कर दी जाएगी और यह खेप अगस्त मध्य तक पहुंचने की उम्मीद है, जो धान की खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण समय होता है।

मानसून से पहले बढ़ी चिंता, भारी कमी की आशंका

नेपाल में धान रोपाई का मौसम जून से शुरू होता है, जिसके लिए लगभग 2.5 लाख टन उर्वरक की जरूरत होती है। लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए भारी कमी की आशंका जताई जा रही है। फिलहाल सरकारी भंडार में 1.71 लाख टन उर्वरक मौजूद है, जबकि लगभग 94,450 टन की सप्लाई ठेकेदारों द्वारा नहीं दी जा पाने की वजह से रद्द होने की कगार पर है।

वैश्विक संकट का असर—कीमतें आसमान पर

पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण उर्वरकों की कीमतों में भारी उछाल आया है। नेपाल सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष में 5.5 लाख टन उर्वरक खरीदने का लक्ष्य रखा था, लेकिन बढ़ती कीमतों के कारण यह क्षमता घटकर करीब 4.4 लाख टन रह गई है।

सरकार ने उर्वरक पर 28.82 अरब नेपाली रुपये की सब्सिडी तय की है, लेकिन मौजूदा कीमतों पर पूरी तरह सब्सिडी देना सरकार के लिए संभव नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि अगर पूरी सब्सिडी दी जाए तो लगभग 80 अरब रुपये की जरूरत पड़ेगी, जो अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डाल सकता है।

किसानों पर सीधा असर, उत्पादन पर खतरा

उर्वरक की कमी का सीधा असर किसानों पर पड़ेगा। इससे न केवल फसल उत्पादन घट सकता है, बल्कि खाद्य कीमतों में भी वृद्धि हो सकती है। नेपाल में चावल प्रमुख खाद्य पदार्थ है, जो कुल अनाज खपत का लगभग 67 प्रतिशत हिस्सा है। ऐसे में उर्वरक संकट खाद्य सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है।

आयात व्यवस्था की पुरानी कमजोरियां फिर उजागर

नेपाल में उर्वरक की कमी कोई नई समस्या नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, कमजोर वितरण प्रणाली, पर्याप्त भंडारण की कमी, नीति संबंधी खामियां और वैश्विक बाजार पर निर्भरता इस समस्या की मुख्य वजह हैं। कीमतों में उतार-चढ़ाव के दौरान कई आपूर्तिकर्ता अनुबंध तोड़ देते हैं, जिससे संकट और गहरा जाता है।

रूस से आपूर्ति भी मुश्किल, बैंकिंग बाधा बनी रुकावट

नेपाल खाड़ी देशों के अलावा रूस से भी उर्वरक आयात करता है, लेकिन मौजूदा हालात में नेपाली बैंक रूसी आपूर्तिकर्ताओं के लिए लेटर ऑफ क्रेडिट खोलने में हिचकिचा रहे हैं। इससे वैकल्पिक आपूर्ति चैनल भी प्रभावित हो रहे हैं और भारत पर निर्भरता बढ़ रही है।

G2G समझौते का विस्तार जरूरी

भारत और नेपाल के बीच 2022 में पांच साल का G2G समझौता हुआ था, जिसके तहत नेपाल की उर्वरक जरूरत का कम से कम 30 प्रतिशत भारत से सुनिश्चित किया गया था। यह समझौता मार्च 2026 में समाप्त हो चुका है, लेकिन इसे आगे बढ़ाने के प्रयास जारी हैं। अधिकारियों का कहना है कि इस समझौते का विस्तार नेपाल के लिए बेहद जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसे संकट से बचा जा सके।

मानसून और अर्थव्यवस्था पर दोहरी चुनौती

मौसम विशेषज्ञों ने इस साल सामान्य से कम मानसून की आशंका जताई है। ऐसे में उर्वरक की कमी और बारिश में कमी का दोहरा असर कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है। इससे ग्रामीण आय घट सकती है, खाद्य आयात बढ़ सकता है और देश की आर्थिक स्थिति पर भी दबाव पड़ सकता है।

खाद्य सुरक्षा पर मंडराता खतरा

नेपाल का यह कदम तत्काल संकट से निपटने की कोशिश जरूर है, लेकिन यह समस्या की गहराई को भी उजागर करता है। उर्वरक की उपलब्धता, वैश्विक कीमतों और मौसम की अनिश्चितता के बीच नेपाल की कृषि और खाद्य सुरक्षा दोनों चुनौती के दौर से गुजर रही हैं। आने वाले महीनों में सरकार की नीतियां और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही तय करेंगे कि यह संकट कितना गहराता है।

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