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मोदी की भड़काऊ बयानबाजी: लोकतंत्र में जहर घोलने की राजनीति

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 28 फरवरी 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाषणों की शैली लंबे समय से विवादास्पद रही है, जहां वे अक्सर विपक्ष पर हमला करने के लिए सांप्रदायिक, ध्रुवीकरण वाली और अतिरंजित भाषा का इस्तेमाल करते हैं। यह कोई नई बात नहीं है। 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान मोदी ने कहा था कि “दंगाई कपड़ों से पहचाने जाते हैं” – एक ऐसा बयान जो स्पष्ट रूप से मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाता नजर आया और देशभर में आक्रोश पैदा किया। यह बयान उस समय की चुनावी रैली में दिया गया था, जब प्रदर्शनकारी हिंसा की आग में झुलस रहे थे, लेकिन प्रधानमंत्री की भाषा ने समाज को और विभाजित करने का काम किया। इसी तरह, 2024 के लोकसभा चुनावों में मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि अगर विपक्ष सत्ता में आया तो “आपके घरों का सोना लेकर ज्यादा बच्चों वालों को दे देंगे” – यहां “ज्यादा बच्चों वाले” का इशारा स्पष्ट रूप से एक विशेष समुदाय की ओर था। उन्होंने आगे कहा कि “माताओं-बहनों का मंगलसूत्र भी छीन लिया जाएगा”, जो महिलाओं की भावनाओं को भड़काने और डर पैदा करने का स्पष्ट प्रयास था। और तो और, अपनी अतिरंजित शैली में उन्होंने यह तक कहा कि विपक्ष “बिजली के तार काटकर ले जाएगा और पानी की टोटियां भी खोलकर ले जाएगा” – हालांकि यह बयान बेतुका और नफरती है, लेकिन मोदी की रैलियों में ऐसी भाषा से मतदाताओं में भय और विभाजन का माहौल बनता है। ये सभी उदाहरण मोदी की राजनीति का पैटर्न दिखाते हैं: झूठ, फरेब, नफरत और हिंसा को बढ़ावा देने वाली भाषा, जो चुनावी फायदे के लिए समाज को तोड़ती है।

अब आते हैं उनकी हालिया स्पीच पर, जिसमें शनिवार को उन्होंने कांग्रेस को “MMC” यानी “मुस्लिम लीगी माओवादी कांग्रेस” करार दिया। यह बयान न सिर्फ विपक्ष पर व्यक्तिगत हमला है, बल्कि देश की राजनीति को ध्रुवीकरण और नफरत की आग में झोंकने का प्रयास है। मोदी कहते हैं कि कांग्रेस के “कुकर्मों” को देश माफ नहीं करेगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी भाषा खुद प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाती? यह एक थप्पड़ है उस लोकतांत्रिक परंपरा पर, जहां बहस नीतियों पर होनी चाहिए, न कि सांप्रदायिक और वैचारिक लेबल चिपकाने पर। कांग्रेस को मुस्लिम लीग (जो ऐतिहासिक रूप से विभाजन से जुड़ी है) और माओवाद (जो हिंसा और विद्रोह का प्रतीक माना जाता है) से जोड़कर एक खतरनाक नैरेटिव गढ़ना, मोदी की पुरानी शैली का हिस्सा है – जैसे दंगाइयों को कपड़ों से पहचानना या संपत्ति छीनने की धमकी देना।

अब लोग जानना चाहते हैं कि मोदी कितने नीचे स्तर पर उतर सकते हैं? झूठ और फरेब की राजनीति तो जैसे पहचान है। कांग्रेस पर माओवादी होने का आरोप लगाना, जबकि खुद की सरकार पर नक्सलवाद से निपटने में नाकामी के आरोप लगते रहते हैं, एक दोहरा मापदंड है। नफरत फैलाना, हिंसा भड़काना, दंगे-फसाद को राजनीतिक हथियार बनाना – यह सब एक घटीया राजनीति का हिस्सा है, जो देश को कमजोर करती है। किसी भी व्यक्ति को ऐसी नफरती भाषा और लोगों में वैमनस्यता फैलाने के लिए कड़ी सजा मिलनी चाहिए? कानूनी रूप से शायद नहीं, लेकिन मतदाताओं की अदालत में जरूर। लोकतंत्र में नेता को जवाबदेह होना चाहिए, और ऐसी भाषा का जवाब वोट से दिया जा सकता है।

राजनीति में ऐसी भाषा सिर्फ मोदी तक सीमित नहीं है। मोदी के नेतृत्व में उनकी ही पार्टी के कई नेता अक्सर व्यक्तिगत हमलों पर उतर जाते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की जिम्मेदारी ज्यादा है। उन्हें ऊंचे स्तर पर बहस करनी चाहिए – अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्या पर। न कि MMC जैसे सस्ते लेबल चिपकाकर या मंगलसूत्र छीनने की बात करके। यह स्पीच एक चेतावनी है: अगर राजनीति इसी राह पर चली, तो देश का लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। समय है कि सभी नेता संयम बरतें और सच्ची बहस की ओर लौटें। देश के लिए कुछ कंस्ट्रक्टिव करें, न कि डिस्ट्रैक्टिव मानसिकता थोपें।

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