राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 मार्च 2026
देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस प्रवक्ता Supriya Shrinate ने आरोप लगाया है कि केंद्र की Bharatiya Janata Party सरकार अब सवाल पूछने वालों से डरने लगी है और इसी वजह से सोशल मीडिया पर सक्रिय आवाज़ों को दबाया जा रहा है।
श्रीनेत के अनुसार, आज सुबह कई ऐसे ट्विटर अकाउंट्स को भारत में ब्लॉक कर दिया गया, जो सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे थे और आम लोगों के मुद्दों को उठा रहे थे। उन्होंने इसे “नया ट्रेंड” बताते हुए कहा कि पहले कंटेंट हटवाया जाता है और फिर पूरे अकाउंट को ही बैन कर दिया जाता है, ताकि असहमति की आवाज पूरी तरह खत्म हो जाए।
उन्होंने सीधे तौर पर केंद्रीय मंत्री Ashwini Vaishnaw के मंत्रालयों—इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय—पर आरोप लगाया कि आईटी एक्ट की धारा 69A के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर दबाव बनाकर यह कार्रवाई कराई जा रही है। उनके मुताबिक, अब “सरकारी बाबू” यह तय कर रहे हैं कि जनता क्या देखे और क्या नहीं।
कांग्रेस नेता ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताते हुए कहा कि जब मुख्यधारा का मीडिया पहले ही दबाव में नजर आता है, तब सोशल मीडिया ही एक ऐसा मंच बचता है जहां आम आदमी अपनी बात रख सकता है। लेकिन अब उस मंच को भी नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है।
प्रधानमंत्री Narendra Modi पर तीखा हमला बोलते हुए श्रीनेत ने कहा कि यह सरकार आलोचना से घबराती है। “अगर सवाल पूछने पर अकाउंट ब्लॉक किए जाएंगे, तो यह लोकतंत्र नहीं बल्कि डर की राजनीति है,” उन्होंने कहा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि “आप कितने ही अकाउंट बंद कर दीजिए, लेकिन सवाल खत्म नहीं होंगे—बल्कि यह आपके डर और विफलता को ही उजागर करेगा।”
श्रीनेत ने चेतावनी दी कि आज जिन अकाउंट्स पर कार्रवाई हुई है, कल यह किसी भी आम नागरिक के साथ हो सकता है। उनके मुताबिक, बिना स्पष्ट कारण के अकाउंट ब्लॉक करना न सिर्फ अन्याय है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी है।
हालांकि सरकार की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन आईटी कानून के तहत कंटेंट ब्लॉक करने की प्रक्रिया को पहले “कानूनी” और “जरूरी” बताया जाता रहा है। इसके बावजूद, यह मुद्दा अब एक बड़े सवाल में बदल चुका है—क्या भारत में सवाल पूछना अब जोखिम भरा होता जा रहा है?
फिलहाल, राजनीतिक बयानबाज़ी अपने चरम पर है, लेकिन असली चिंता यही है कि अगर आवाज़ उठाने वालों को ही चुप कराया जाएगा, तो लोकतंत्र की बुनियाद कितनी मजबूत रह पाएगी।




