एबीसी डेस्क 29 दिसंबर 2025
सीमाएँ नक्शों में होती हैं, आसमान में नहीं:
अद्भुत, रोमांचक और अविश्वसनीय उड़ान,
मणिपुर—प्रकृति कभी-कभी ऐसे चमत्कार दिखा देती है, जो इंसान को भी हैरान कर देते हैं। इसी कड़ी में इस महीने वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) द्वारा मणिपुर में सैटेलाइट टैग किए गए तीन अमूर फाल्कन अब अफ्रीका पहुंच चुके हैं। महज 5 से 6 दिनों में करीब 6000 किलोमीटर की उड़ान भरकर इन नन्हे परिंदों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रकृति की उड़ानें किसी सीमा को नहीं मानतीं। वाकई, यह यात्रा अद्भुत, रोमांचक और अविश्वसनीय है—एक ऐसी उड़ान, जो हमें याद दिलाती है कि सीमाएँ नक्शों में होती हैं, आसमान में नहीं। इन तीन अमूर फाल्कन—Along, Apapang और Ahu—ने भारत से उड़ान भरते ही अलग-अलग रास्ते चुने। Along सीधे दक्षिण अफ्रीका तक पहुंच गया, जबकि Apapang ने केन्या में उतरकर विश्राम किया और Ahu ने सोमालिया में लैंडिंग की। खास बात यह है कि तीनों ने अलग-अलग रूट और अलग-अलग स्टॉपओवर चुने, जिससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल रही है कि ये पक्षी मौसम, हवाओं और भोजन की उपलब्धता के आधार पर कैसे अपने रास्ते तय करते हैं।
अमूर फाल्कन दुनिया के सबसे लंबी दूरी तय करने वाले प्रवासी पक्षियों में गिने जाते हैं। हर साल ये पक्षी पूर्वी एशिया और भारत से अफ्रीका तक हजारों किलोमीटर की उड़ान भरते हैं। यह सफर वे समुद्र के ऊपर से बिना रुके भी करते हैं, जहां न तो आराम की जगह होती है और न ही भोजन का कोई निश्चित स्रोत। विशेषज्ञों के मुताबिक, ये फाल्कन उड़ान के दौरान हवा की दिशा, ऊंचाई और मौसम का बेहद सटीक इस्तेमाल करते हैं, जिससे वे इतनी लंबी दूरी कम समय में तय कर पाते हैं।
वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा सैटेलाइट टैगिंग का मकसद इन पक्षियों की माइग्रेशन रूट, ठहरने की जगहों और संभावित खतरों को समझना है। इससे न सिर्फ अमूर फाल्कन बल्कि अन्य प्रवासी पक्षियों के संरक्षण की रणनीति बनाने में मदद मिलेगी। खासतौर पर यह जानना बेहद जरूरी है कि ये पक्षी किन इलाकों में ज्यादा खतरे में होते हैं और किन जगहों को सुरक्षित घोषित करने की जरूरत है।
मणिपुर पहले भी अमूर फाल्कन संरक्षण की मिसाल बन चुका है, जहां स्थानीय समुदायों ने शिकार छोड़कर इन पक्षियों की रक्षा का बीड़ा उठाया। आज जब मणिपुर से उड़ान भरकर ये फाल्कन अफ्रीका की धरती तक पहुंच रहे हैं, तो यह सिर्फ वैज्ञानिक सफलता नहीं, बल्कि इंसान और प्रकृति के बीच बेहतर तालमेल की कहानी भी है।





