सरोज सिंह | पटना 6 नवंबर 2028
बिहार के चुनाव ने एक बार फिर सवाल उठा दिया है कि आखिर सुशासन का असली अर्थ क्या है? क्या सड़क बनाने से सुशासन आता है? क्या दीवारों पर रंग कर देने से विकास दिखता है? क्या अखबारों में करोड़ों के विज्ञापन देकर जनता की तकलीफें छुपाई जा सकती हैं? बिहार की जनता ने लंबे समय तक इंतज़ार किया कि शायद सरकार बदल जाएगी, उम्मीदें बदलेगीं, और उनके बच्चों को रोज़गार मिलेगा। पर आज भी तस्वीर वैसी ही है—युवाओं का पलायन जारी है, अस्पतालों में व्यवस्था दम तोड़ रही है, सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी चीखती है, और गाँव से लेकर शहर तक एक ही पीड़ा गूंजती है—बिहार में सुरक्षित जीवन और बेहतर भविष्य कब मिलेगा? महागठबंधन का दावा है कि अब लड़ाई केवल कुर्सी की नहीं बल्कि आम आदमी के सम्मान और अधिकार की है; लड़ाई इस बात की है कि बिहार का बेटा अपने घर में रहकर काम कर सके, उसके माँ-बाप को अपने जिगर के टुकड़े को हज़ारों किलोमीटर दूर न भेजना पड़े।
पर इस उम्मीद के बीच डेटा और रिकॉर्ड की एक भयावह सच्चाई सामने आई है—वही सरकार जिसे कभी “सुशासन बाबू” के नाम से महिमामंडित किया गया, आज भ्रष्टाचार, अपराध और प्रशासनिक विफलता की प्रतीक बन चुकी है। हाल ही में आई CAG रिपोर्ट बिहार सरकार की आर्थिक पारदर्शिता की सच्चाई खोलकर रख देती है। रिपोर्ट के अनुसार 70 हज़ार करोड़ रुपये का सरकारी हिसाब गायब है — न कागज़, न प्रमाण, न उपयोग का विवरण। इतने बड़े पैमाने पर धन कहाँ गया? क्या यह पैसा अस्पताल बनाने में लगा? क्या यह युवाओं के रोज़गार सृजन में लगा? या फिर यह किसी अदृश्य हाथों द्वारा निगल लिया गया? सरकार के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं। जनता का टैक्स, जनता की कमाई और जनता का भविष्य — सबकुछ भ्रष्टाचार की आग में झुलस रहा है, और सत्ता के गलियारों में खामोशी पसरी है।
और भी बड़ा विस्फोट तब हुआ जब अपनी ही पार्टी के केंद्रीय मंत्री आर.के. सिंह ने 62 हज़ार करोड़ रुपये के एक और घोटाले का आरोप नीतीश कुमार की सरकार पर लगा दिया। वे बताते हैं कि अडानी समूह को जमीन देने में भारी वित्तीय गड़बड़ी और मनमानी की गई — यह आरोप कोई विपक्ष का नहीं बल्कि सत्ता के मुख्य स्तंभ में बैठे व्यक्ति का है। यह इस बात का प्रमाण है कि डबल इंजन सरकार की गाड़ी अंदर से जंग खा चुकी है। जब अपने ही भ्रष्टाचार की पोल खोलें, तब समझिए कि व्यवस्था कितनी सड़ चुकी है और जनता का विश्वास कितनी बार टूटा है। यह सवाल उठना लाजिमी है कि जिस सरकार के नेता ही उस पर भरोसा छोड़ दें, वह जनता के हित की रक्षा कैसे करेगी?
भ्रष्टाचार के साथ-साथ कानून व्यवस्था की स्थिति ने भी बिहार को शर्मसार कर रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी रैलियों में लालू-राबड़ी सरकार के दौरान 37 हज़ार अपहरण का जिक्र कर जंगलराज का टैग लगाने से नहीं चूके। पर उन्हीं की सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि नीतीश कुमार के पिछले मात्र 8 सालों में 81 हज़ार अपहरण हुए — यानी जंगलराज का आरोप लगाते-लगाते, सुशासन के नाम पर उससे भी दो गुना बुरी स्थिति पैदा हो गई। और यदि नीतीश राज के पूरे करीब 20 साल का रिकॉर्ड देखें तो सवा लाख से अधिक अपहरण और फिरौती के मामले सामने आते हैं। गृह मंत्रालय की रिपोर्टें बताती हैं कि बिहार महिला अपराध, दुष्कर्म, हत्या और गैंगवार के मामलों में शीर्ष पर रहा है। एक गरीब पिता की बिटिया घर से निकलते हुए कांपती है, एक मेहनतकश बेटे की माँ दरवाज़े पर खड़ी उसकी सुरक्षित वापसी का इंतज़ार करती रहती है — यही है उस सुशासन की सच्चाई जिसे सत्ता ने चमकदार पोस्टरों में सजाने की कोशिश की।
जब जनता के जीवन की सुरक्षा खत्म हो जाए, शिक्षा और स्वास्थ्य बदहाल हो जाएं, खजाने से हजारों करोड़ गायब पाए जाएं और बहाने ही जवाब बन जाएं, तब शासन नहीं, शोषण होता है; प्रशासन नहीं, अपराधियों की आस्था का केंद्र बन जाता है। अब यह जनता की अदालत है — और इस अदालत में सबूत बहुत भारी हैं। बिहार समझ चुका है कि “जंगलराज” का लेबल सिर्फ सत्ता की राजनीति के लिए इस्तेमाल हुआ था, लेकिन वास्तविक जंगलराज तो वहीं है जहाँ अपराध पनपते हैं और सरकारें सोती रहती हैं।
इसलिए चुनाव आज सिर्फ जीत-हार का खेल नहीं — यह जनता का गंभीर फैसला है। बिहार को अब चुनना है —
क्या वह लूट और अपराध के इस कुचक्र को आगे बढ़ने देगा या विकास, शिक्षा, रोज़गार और सुरक्षा का नया अध्याय खोलेगा? क्या वह टूटे हुए सपनों को कुशासन के हवाले कर देगा या बदलाव की अग्नि जलाकर सत्ता को उसके अहंकार से जगाएगा?
अब बिहार की जनता बोल रही है — और उसका फैसला आने वाली पीढ़ियों की दिशा तय करेगा। क्योंकि इस बार का संघर्ष सिर्फ सत्ता बदलने का नहीं, बिहार का भाग्य बदलने का है।




