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केजरीवाल–सिसोदिया के केस पर 56 करोड़ का खर्च, 34 करोड़ तो सिंघवी को मिली फीस: सरकारी खजाने से लुटाने पर सवाल

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राष्ट्रीय / राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 6 अप्रैल 2026

दिल्ली की चर्चित शराब नीति से जुड़े मामलों में कानूनी लड़ाई पर हुए भारी खर्च को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। आरोप है कि इन मामलों में करोड़ों रुपये सरकारी खजाने से खर्च किए गए, जिस पर अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह पैसा जनता के हित में इस्तेमाल हुआ या नहीं।

जानकारी के मुताबिक, दिल्ली की पूर्व सरकार के कार्यकाल में Arvind Kejriwal और Manish Sisodia से जुड़े मामलों की पैरवी के लिए वरिष्ठ वकीलों को भारी फीस दी गई। आरोपों के अनुसार, केवल इन मामलों में कुल खर्च करीब 56 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात कही जा रही है।

बताया जा रहा है कि कांग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता Abhishek Manu Singhvi को शराब नीति से जुड़े केस में करीब 18.97 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। वहीं, यह भी दावा किया जा रहा है कि कुल 21.50 करोड़ रुपये वकीलों को दिए गए, जबकि केजरीवाल की जमानत से जुड़े मामले में उनकी फीस लगभग 34 करोड़ रुपये तक बताई जा रही है।

इसके अलावा, जमानत मामले में फीस को लेकर विवाद भी सामने आया। उपराज्यपाल की ओर से इस पर आपत्ति जताते हुए कहा गया कि जनता के पैसे का उपयोग व्यक्तिगत मामलों में नहीं होना चाहिए। हालांकि बाद में इस पर कानूनी बहस और प्रक्रिया आगे बढ़ी।

हालांकि, इन दावों और आंकड़ों को लेकर आधिकारिक स्तर पर अलग-अलग पक्ष सामने आते रहे हैं। कानूनी जानकारों का कहना है कि सरकारें कई बार अपने पदाधिकारियों के खिलाफ मामलों में सरकारी खर्च पर वकील उपलब्ध कराती हैं, लेकिन इसकी सीमा और वैधता को लेकर स्पष्ट नियम और प्रक्रियाएं भी लागू होती हैं।

इस पूरे मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। एक ओर विपक्ष इसे “जनता के पैसे का दुरुपयोग” बता रहा है, तो दूसरी ओर समर्थकों का तर्क है कि सरकारी पद पर रहते हुए लिए गए निर्णयों से जुड़े मामलों में कानूनी सहायता देना शासन का हिस्सा होता है।

इस बीच, सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि इन आंकड़ों और दावों की अंतिम पुष्टि न्यायिक और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही मानी जाएगी।

दिल्ली की मौजूदा मुख्यमंत्री Rekha Gupta के नेतृत्व में अब इस तरह के खर्चों और प्रक्रियाओं की समीक्षा को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर और गहराने की संभावना है।

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