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इज़राइल का बड़ा कदम: मणिपुर–मिजोरम के बेने मेनाशे यहूदियों को बसाने की योजना तेज

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इजराइल सरकार ने एक ऐतिहासिक और रणनीतिक निर्णय लेते हुए घोषणा की है कि वह भारत के पूर्वोत्तर राज्यों—मणिपुर और मिजोरम—में रहने वाली बेने मेनाशे यहूदी समुदाय के हजारों सदस्यों को अपने देश में बसाने की प्रक्रिया तेज़ करेगी। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की अगुवाई वाली सरकार लंबे समय से इस समुदाय को “लॉस्ट ट्राइब्स ऑफ इजराइल” (इज़राइल की खोई हुई जनजातियाँ) में से एक मानती आई है, और अब सुरक्षा, जनसांख्यिकी और धार्मिक पहचान को लेकर इजराइल नए सिरे से इन समुदायों को वहां लाने की दिशा में एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है। इस निर्णय ने भारत और इजराइल दोनों देशों में राजनीतिक–सामाजिक चर्चाओं को नई दिशा दी है।

बेने मेनाशे कौन हैं?

यह समुदाय भारत के दो राज्यों—मणिपुर और मिजोरम—में 3000 वर्ष पुरानी परंपरा से रहने वाला समूह है, जो स्वयं को ‘मिनाशी’ जनजाति का वंशज मानता है। दावा है कि वे बाइबिल में वर्णित प्राचीन 10 “खोई हुई जनजातियों” में से एक हैं और सदियों पहले अपने मूल स्थान से पूर्व की ओर प्रवास करते हुए भारत के पूर्वोत्तर में बस गए। इनके रीति–रिवाज, भोजन, संगीत, पूजा-अर्चना और परिवार प्रणाली में यहूदी परंपराओं से कई समानताएँ पाई जाती हैं। पिछले तीन दशकों में इस समुदाय के लगभग 5,000 लोग पहले ही इजराइल में बस चुके हैं, और अब शेष समुदाय को भी वहां ले जाने पर विचार हो रहा है।

नेतन्याहू सरकार का पूरा प्लान क्या है?

इजराइल के आंतरिक मंत्रालय और जनसांख्यिकी मंत्रालय ने एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया है, जिसके तहत मणिपुर–मिजोरम के हजारों बेने मेनाशे सदस्यों को चरणबद्ध तरीके से उत्तरी इजराइल के उन क्षेत्रों में बसाया जाएगा, जहाँ जनसंख्या वृद्धि और श्रमबल की आवश्यकता है। यह फैसला एक ऐसे दौर में लिया गया है जब इजराइल सुरक्षा चुनौतियों, जनसंख्या संरचना में बदलाव और यहूदी पहचान को संरक्षित करने की नीति पर तेज़ी से काम कर रहा है। सरकार का मानना है कि यह समुदाय धार्मिक रूप से “इजराइल के मूल” का हिस्सा है और उसे इजराइल लौटने की अनुमति मिलनी चाहिए।

यह कदम केवल धार्मिक आधार पर नहीं है—इजराइल इसे एक सामरिक–मानवीय परियोजना के रूप में भी देख रहा है। देश की उत्तरी सीमाओं, खासकर लेबनान–सीरिया के पास के इलाकों में यहूदियों की आबादी बढ़ाना एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसलिए बेने मेनाशे को “नॉर्थ इजराइल रीसेटलमेंट प्रोग्राम” में शामिल किया गया है, जहाँ उन्हें आवास, भाषा प्रशिक्षण, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी।

भारत–इजराइल संबंधों पर इसका क्या प्रभाव होगा?

भारत सरकार ने इस विषय पर अभी आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन पहले भी ऐसे स्थानांतरणों को मानवीय और धार्मिक कारणों से अनुमति दी गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रक्रिया स्थानीय राजनीति को प्रभावित कर सकती है, खासकर मणिपुर और मिजोरम जैसे संवेदनशील राज्यों में, जहाँ पहले से जनजातीय पहचान, प्रवास और सुरक्षा को लेकर हालात तनावपूर्ण रहे हैं। यदि हजारों लोग इजराइल माइग्रेट करते हैं, तो क्षेत्र की जनसांख्यिकी, सामाजिक ढांचा और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर इसका स्पष्ट प्रभाव पड़ेगा।

समुदाय का अनुभव और चुनौतियाँ

इजराइल पहुँचे बेने मेनाशे समुदाय के लोग यहूदी धर्म में औपचारिक रूपांतरण, भाषा–संस्कृति अनुकूलन और रोजगार को लेकर कई चुनौतियों का सामना करते हैं। हालांकि, इजराइल की धार्मिक–सामाजिक संस्थाएँ और NGOs इस समुदाय को व्यापक सहायता देते हैं, ताकि वे नए समाज में घुल–मिल सकें। सरकार इस बार नए माइग्रेशन कार्यक्रम में पहले से अधिक संसाधन लगाने की तैयारी में है।

इजराइल का यह फैसला धार्मिक, सामरिक और जनसांख्यिकीय—तीनों आयामों से महत्वपूर्ण है। भारत के मणिपुर–मिजोरम की धरती से हज़ारों साल पुरानी पहचान लेकर निकलने वाला यह समुदाय अब एक नए देश, नई भाषा और नए जीवन की ओर बढ़ रहा है। बेने मेनाशे के लिए यह कदम एक सपने जैसा है—“वापसी” का सपना। वहीं वैश्विक राजनीति के नज़रिए से यह इजराइल की एक बड़ी जनसांख्यिकीय रणनीति का हिस्सा है, जिसके प्रभाव दोनों देशों की कूटनीति में भी दिखाई देंगे।

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