राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 मार्च 2026
पटियाला हाउस कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने Delhi Police की स्पेशल सेल की पूरी जांच को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एडिशनल सेशंस जज Amit Bansal ने जमशेद ज़हूर पॉल और परवेज राशिद नाम के दो कश्मीरी युवकों को Unlawful Activities Prevention Act (UAPA) की धारा 18 और 20 के साथ-साथ आर्म्स एक्ट की धारा 25 के तहत लगे सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया। ये दोनों युवक साल 2018 से जेल में बंद थे—यानी करीब 8 साल तक सलाखों के पीछे रहे।
पुलिस का आरोप था कि दोनों ISIS से जुड़े हुए थे, उत्तर प्रदेश से हथियार खरीद रहे थे, BBM चैट्स के जरिए संपर्क में थे और टेरर फंडिंग में शामिल थे। लेकिन अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि इनमें से एक भी आरोप साबित नहीं हुआ। न किसी आतंकी संगठन से संबंध का कोई पुख्ता सबूत मिला, न किसी साजिश का, और न ही हथियारों की बरामदगी को विश्वसनीय माना गया।
कोर्ट ने अपने फैसले में सबसे गंभीर टिप्पणी हथियारों और गोला-बारूद की बरामदगी को लेकर की। जज ने कहा कि इस पूरी रिकवरी पर “गंभीर संदेह” है। जब्ती दस्तावेजों पर FIR नंबर पहले से दर्ज पाया गया, जिससे यह शक पैदा होता है कि या तो FIR पहले दर्ज की गई या बाद में दस्तावेजों में जोड़ा गया। दोनों ही स्थितियां पुलिस की कहानी को कमजोर करती हैं और जांच की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करती हैं।
इसके अलावा, अदालत ने यह भी पाया कि मोबाइल फोन 7 सितंबर को बरामद किए गए थे, लेकिन उन्हें लगभग दो महीने तक सील नहीं किया गया। इस देरी ने छेड़छाड़ (टैंपरिंग) की आशंका को और मजबूत कर दिया। रिकवरी के समय कोई स्वतंत्र गवाह भी अदालत में पेश नहीं किया गया। अभियोजन पक्ष ने कुल 23 गवाह पेश किए, लेकिन वे आरोपों को साबित करने में नाकाम रहे। जज ने अपने फैसले में साफ लिखा कि पूरे मामले में “great deal of doubt” मौजूद है।
इस फैसले के बाद कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। आखिर इन दो युवकों के 8 साल कौन लौटाएगा? वे अपने घरों से दूर, जेल में बंद रहे, जबकि उनके खिलाफ आरोप अदालत में टिक नहीं सके। परिवारों ने लंबा इंतजार किया, जिंदगी के अहम साल गुजर गए—लेकिन अब जब वे बरी हुए हैं, तो जिम्मेदारी तय करने का सवाल सामने है।
यह मामला एक बार फिर UAPA जैसे सख्त कानून के इस्तेमाल और उसके संभावित दुरुपयोग पर बहस को तेज करता है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे मामलों में “प्रोसेस ही सजा बन जाती है”—गिरफ्तारी, लंबी हिरासत और वर्षों तक चलने वाला ट्रायल, भले ही अंत में आरोपी बरी क्यों न हो जाए।
मानवाधिकार संगठनों, जिनमें Association for Protection of Civil Rights (APCR) भी शामिल है, ने इस फैसले को महत्वपूर्ण बताया है, लेकिन साथ ही मुआवजे और जवाबदेही की मांग भी उठाई है। सवाल यह है कि क्या जांच में खामियों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होगी? क्या इन युवकों को उनके खोए हुए वर्षों के लिए कोई मुआवजा मिलेगा?
यह मामला सिर्फ जमशेद और परवेज तक सीमित नहीं है, बल्कि उन तमाम मामलों की याद दिलाता है जहां लोग सालों तक जेल में रहते हैं और बाद में अदालत से बरी हो जाते हैं। अब नजर इस बात पर है कि क्या इस फैसले के बाद सिस्टम में कोई ठोस बदलाव होगा या फिर ऐसे मामले आगे भी सामने आते रहेंगे।




