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हाई-टेक गठजोड़ से भारत बाहर? ‘पैक्स सिलिका’ पर जयराम रमेश का सीधा वार

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एबीसी डेस्क 13 दिसंबर 2025

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने अमेरिका की एक नई वैश्विक पहल को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी के आधार पर दावा किया है कि अमेरिका ने चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से शुरू की गई नौ देशों की हाई-टेक सप्लाई चेन पहल से भारत को बाहर रखा है। इस समझौते को ‘पैक्स सिलिका’ नाम दिया गया है, जिसे चीन केंद्रित ‘पैक्स सिनीका’ के प्रतिकार के रूप में देखा जा रहा है। जयराम रमेश के अनुसार, इस समूह में फिलहाल अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, नीदरलैंड्स, यूनाइटेड किंगडम, इज़राइल, संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, लेकिन भारत का नाम इस सूची में नहीं है।

जयराम रमेश ने इस घटनाक्रम को भारत की विदेश नीति और रणनीतिक साझेदारियों के लिहाज से चिंताजनक बताया है। उन्होंने कहा कि हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एडवांस टेक्नोलॉजी से जुड़ी वैश्विक सप्लाई चेन में शामिल होना किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम होता है। ऐसे में भारत का इस पहल से बाहर रहना न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी नुकसानदेह हो सकता है। उनका मानना है कि यदि भारत इस समूह का हिस्सा होता, तो उसे तकनीक, निवेश और वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में बड़ी भूमिका निभाने का अवसर मिलता।

कांग्रेस नेता ने इस मुद्दे को सीधे तौर पर भारत-अमेरिका संबंधों से भी जोड़ा है। उन्होंने कहा कि 10 मई 2025 के बाद से ट्रंप–मोदी संबंधों में आई कथित ठंडक के मद्देनज़र यह फैसला “अचंभित करने वाला नहीं” लगता। जयराम रमेश के अनुसार, यह वही दौर है जब प्रधानमंत्री ने हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई टेलीफोन बातचीत को लेकर उत्साहपूर्वक पोस्ट किया था और दोनों नेताओं की पुरानी “दोस्ती” तथा सार्वजनिक आयोजनों में दिखाई गई निकटता को याद किया गया था। इसके बावजूद, इतने अहम वैश्विक तकनीकी मंच से भारत का बाहर रहना कई सवाल खड़े करता है।

उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सार्वजनिक मंचों पर दोस्ती और गर्मजोशी के प्रतीकात्मक संकेत दिखाने से कहीं ज्यादा जरूरी है कि ऐसे रिश्तों का ठोस रणनीतिक और आर्थिक लाभ भी देश को मिले। जयराम रमेश के मुताबिक, अगर अमेरिका सचमुच भारत को एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार मानता है, तो उसे ऐसी पहलों में भारत को अग्रणी भूमिका में शामिल करना चाहिए था। भारत जैसे बड़े बाजार, तकनीकी प्रतिभा और भू-राजनीतिक महत्व वाले देश को नजरअंदाज किया जाना सरकार की विदेश नीति की प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है।

इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार बड़े-बड़े दावे तो करती है, लेकिन वैश्विक स्तर पर निर्णायक मंचों पर भारत की वास्तविक हिस्सेदारी कमजोर होती जा रही है। वहीं, यह मुद्दा आने वाले दिनों में संसद और कूटनीतिक विमर्श में भी प्रमुखता से उठ सकता है, क्योंकि हाई-टेक सप्लाई चेन का भविष्य सीधे तौर पर भारत की आर्थिक वृद्धि, रोजगार और वैश्विक प्रभाव से जुड़ा हुआ है।

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