कांग्रेस ने देश को क्या दिया? — यह सवाल अक्सर राजनीतिक बहसों में उछाला जाता है। लेकिन इसका जवाब नारेबाज़ी में नहीं, तथ्यों और वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्टों में छिपा है। वर्ष 2015 में विश्व बैंक समूह द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट “The State of Social Safety Nets 2015” इस बहस को ठोस आधार पर रख देती है। यह रिपोर्ट साफ़ तौर पर बताती है कि दुनिया के पाँच सबसे बड़े सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों में भारत के दो कार्यक्रम—मिड-डे मील (स्कूल फीडिंग प्रोग्राम) और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा)—शामिल हैं। यह कोई राजनीतिक दावा नहीं, बल्कि विश्व बैंक का आधिकारिक आकलन है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत का स्कूल फीडिंग प्रोग्राम (मिड-डे मील) करीब 10.5 करोड़ (105 मिलियन) बच्चों तक पहुँच रखता है, जो इसे दुनिया का सबसे बड़ा स्कूल भोजन कार्यक्रम बनाता है। यह योजना न सिर्फ़ बच्चों के पोषण का आधार बनी, बल्कि स्कूलों में नामांकन बढ़ाने, ड्रॉपआउट कम करने और सामाजिक समानता को मज़बूत करने में भी ऐतिहासिक भूमिका निभाती रही। वहीं मनरेगा, जो ग्रामीण भारत को रोज़गार की कानूनी गारंटी देता है, लगभग 5.8 करोड़ (58 मिलियन) लोगों तक पहुँचा। विश्व बैंक की रिपोर्ट इसे भी वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े सामाजिक सुरक्षा नेटवर्कों में शामिल करती है। यह दोनों योजनाएँ उस दौर की सोच को दर्शाती हैं जब “कल्याण” को बोझ नहीं, बल्कि निवेश माना गया।
विश्व बैंक की रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम मुख्यतः मिडिल-इनकम देशों में हैं और कुल वैश्विक कवरेज का लगभग आधा हिस्सा इन्हीं से आता है। चीन का डिबाओ कार्यक्रम (लगभग 7.5 करोड़ लाभार्थी), ब्राज़ील का बोल्सा फामिलिया (7 करोड़ से अधिक लाभार्थी) और भारत के ये दो कार्यक्रम—यह सूची अपने आप में बताती है कि भारत सामाजिक सुरक्षा के मामले में किसी से पीछे नहीं रहा। खास बात यह है कि भारत के दोनों प्रमुख कार्यक्रम—मिड-डे मील और मनरेगा—कांग्रेस सरकारों की पहल और नीति-दृष्टि का परिणाम हैं, जिनका उद्देश्य था भूख, बेरोज़गारी और असमानता से सीधी टक्कर लेना।
आज जब कोई पूछता है कि कांग्रेस ने देश को क्या दिया, तो जवाब सिर्फ़ इतिहास नहीं, वर्तमान की ज़मीन पर दिखता है—ग्रामीण मज़दूर के हाथ में काम, बच्चे की थाली में भोजन और करोड़ों परिवारों के लिए न्यूनतम सुरक्षा की गारंटी। इसके उलट, आलोचक यह सवाल भी उठा रहे हैं कि अगर भाजपा से पूछा जाए कि उसने देश को क्या दिया, तो जवाब विकास की बजाय विभाजन, नफ़रत और उन प्रतीकों को मिटाने की कोशिश के रूप में क्यों सामने आता है, जिन पर इस देश ने गर्व किया है? जिन योजनाओं ने भारत को वैश्विक मंच पर सामाजिक सुरक्षा का उदाहरण बनाया, उन्हीं के नाम, स्वरूप और स्मृति को बदलने की राजनीति क्यों?
विश्व बैंक की यह रिपोर्ट एक आईना है—उनके लिए जो तथ्यों से भागते हैं और उन आवाज़ों के लिए भी जो इतिहास को मिटाकर नया आख्यान गढ़ना चाहती हैं। सच यह है कि मनरेगा और मिड-डे मील जैसे कार्यक्रमों ने भारत के सामाजिक ताने-बाने को मज़बूत किया, और यह योगदान किसी एक नारे से नहीं, बल्कि करोड़ों ज़िंदगियों में आए ठोस बदलाव से साबित होता है।





