अवधेश कुमार | नई दिल्ली, 25 नवंबर 2025
राजधानी दिल्ली में प्रदूषण के खिलाफ इंडिया गेट पर हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान सामने आई पुलिस कार्रवाई की एक तस्वीर ने सोशल मीडिया पर आग लगा दी है। वायरल हो चुकी इस तस्वीर में एक प्रदर्शनकारी को ज़मीन पर दबोचे हुए एक पुलिसकर्मी उसे जोर से पकड़कर दबाव बनाते दिखाई दे रहा है। प्रदर्शनकारी दर्द में तड़पता नजर आ रहा है और उसके चेहरे पर साफ तौर पर भय और असहायता झलक रही है। इस तस्वीर को NDTV इंडिया के एक पोस्ट के माध्यम से साझा किया गया था, जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया। इसके हटाए जाने ने ही सवालों का एक और नया सिलसिला खोल दिया है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कई यूज़र्स ने इस तस्वीर की तुलना अमेरिका में हुए जॉर्ज फ्लॉयड मामले से की है, जिसकी मौत पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के दौरान उसकी गर्दन पर घुटना दबाने के कारण हुई थी। उस घटना ने न केवल अमेरिकी समाज को हिलाकर रख दिया था, बल्कि सत्ता के गलियारों तक उसका असर पहुंचा था। वहीं भारत में इस तस्वीर पर बहस तो तेज़ हुई है, लेकिन बड़े स्तर पर प्रतिक्रिया या राजनीतिक भूचाल देखने को नहीं मिला है। आलोचकों का कहना है कि भारत में मानवाधिकारों का उल्लंघन और पुलिसिया दमन अक्सर चर्चा में तो आता है, लेकिन व्यवस्था में कोई गंभीर परिवर्तन नहीं दिखाई देता।
दिल्ली में प्रदूषण संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है, जहाँ एयर क्वालिटी इंडेक्स कई क्षेत्रों में खतरनाक स्तर से ऊपर दर्ज किया जा रहा है। ऐसे हालात में नागरिकों द्वारा किए गए प्रदूषण विरोधी प्रदर्शनों को लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा माना जाना चाहिए। परंतु प्रदर्शनकारी सौम्य तरीके से अपनी आवाज उठा रहे थे या किसी तरह की अव्यवस्था फैला रहे थे—इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, जबकि पुलिस ने सुरक्षा और कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए कार्रवाई को उचित बताया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि लोकतंत्र में जनता को आवाज उठाने का अधिकार यदि दमन और हिंसा के साये में दबने लगे, तो संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा कैसे होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक नेतृत्व जनता की सेवा के नाम पर सत्ता में आता है, परंतु सत्ता में पहुंचते ही वही नेतृत्व जनता को नियंत्रित करने, दबाने और शोषित करने का माध्यम बन जाता है। यह स्थिति न केवल जनता का अपमान है, बल्कि संविधान और लोकतंत्र की आत्मा के साथ विश्वासघात है। इसे मानवता के खिलाफ अपराध तक करार दिया जा रहा है।
भारत की राजनीति का यह सबसे बड़ा विरोधाभास माना जा रहा है—जनता जिन प्रतिनिधियों को अपनी आवाज और अधिकारों की रक्षा के लिए चुनती है, वही सत्ता में आते ही खुद को जनता का मालिक समझने लगते हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि ऐसी घटनाओं पर समाज चुप रहा या केवल सोशल मीडिया तक सीमित प्रतिक्रियाएं दी गईं, तो सत्ता का दमन और बढ़ेगा और जनता की लोकतांत्रिक ताकत कमजोर होती जाएगी। कई लोगों ने कटाक्ष करते हुए कहा है कि “यहां के लोग देशभक्त हैं, इसलिए ऐसी तस्वीरों पर कोई राजनीतिक हलचल नहीं होगी,” जो एक गहरी निराशा और सिस्टम पर अविश्वास को दर्शाता है।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि यह तस्वीर सिर्फ एक प्रदर्शन का दृश्य नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, पुलिस कार्रवाई, नागरिक अधिकारों और राजनीतिक संवेदनशीलता पर एक बड़ा सवालचिह्न खड़ा करती है। अब देखना यह है कि क्या यह मामला केवल सोशल मीडिया ट्रेंड तक सीमित रहता है या इससे वास्तविक सुधार और जवाबदेही की मांग भी उठती है।





