गुवाहाटी 13 नवंबर 2025
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक बार फिर ऐसा बयान दिया है जो भारत की धर्मनिरपेक्ष भावना और सामाजिक एकता पर गहरी चोट करता है। उन्होंने दिल्ली में हुए हालिया ब्लास्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “जो लोग वंदे मातरम नहीं गा सकते, वे भारतीय नहीं हैं… अगर कोई भारतीय नहीं है, तो वह भारत माता को अपनी मां नहीं मान सकता।” इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि “शिक्षा से आतंकवाद खत्म नहीं होता, बल्कि पढ़े-लिखे लोग ज्यादा ख़तरनाक हो जाते हैं… डॉक्टर बनने के बाद वे और ज़्यादा विस्फोटक बना सकते हैं।”
यह बयान सिर्फ राजनीतिक गैर-जिम्मेदारी का उदाहरण नहीं, बल्कि एक मुख्यमंत्री की ओर से दिया गया घृणापूर्ण और विभाजनकारी वक्तव्य है, जो संवैधानिक शपथ और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन करता है। भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता, धर्म की स्वतंत्रता और विचार की आज़ादी की गारंटी देता है। किसी नागरिक के देशभक्ति या नागरिकता को उसकी धार्मिक पहचान या ‘वंदे मातरम’ गाने की क्षमता से जोड़ना, संविधान की आत्मा का अपमान है।
मुख्यमंत्री ने अपने बयान में यह भी कहा कि “जो डॉक्टर पकड़ा गया था, वह ‘लव जिहाद’ में शामिल था… वह कॉलेज में पढ़ते समय हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़कों से शादी करवाकर उनका धर्म परिवर्तन करवाता था।” इस तरह के कथन न केवल मुस्लिम समुदाय के प्रति नफरत फैलाते हैं, बल्कि पूरे समाज में धार्मिक अविश्वास और भय का माहौल बनाते हैं। यह “विभाजन की राजनीति” का क्लासिक उदाहरण है — जहां सत्ता अपने शासन की असफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए नफरत का एजेंडा आगे बढ़ाती है।
एक मुख्यमंत्री, जो संविधान की शपथ लेकर सत्ता में बैठा है, उससे अपेक्षा होती है कि वह नागरिकों में विश्वास, समानता और सौहार्द का संदेश दे। लेकिन जब वही मुख्यमंत्री इस तरह के ‘हिंदू-मुस्लिम’ विभाजनकारी भाषण देता है, तो यह न केवल नैतिक अपराध है, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी गंभीर मामला बनता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 295A के तहत किसी भी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करना दंडनीय अपराध है। हिमंत बिस्वा सरमा का यह बयान इस श्रेणी में आता है और उनके खिलाफ FIR दर्ज की जानी चाहिए।
राज्य का मुखिया जब ‘वंदे मातरम’ गाने या ‘लव जिहाद’ जैसे झूठे नैरेटिव्स को नागरिकता का पैमाना बना देता है, तब यह सिर्फ एक बयान नहीं रहता — यह लोकतंत्र के स्तंभों को कमजोर करने का संगठित प्रयास बन जाता है। यह बयान भारत की उस विविधता, उस एकता, और उस धर्मनिरपेक्ष पहचान का मज़ाक उड़ाता है जिस पर यह राष्ट्र खड़ा है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि राजनीतिक असहमति और धार्मिक पहचान के बीच की रेखा को फिर से स्पष्ट किया जाए। भारत का लोकतंत्र किसी एक धर्म या विचारधारा की बपौती नहीं है। देश का संविधान सभी नागरिकों का है — चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या भाषा से हों। और अगर किसी मुख्यमंत्री को यह समझ नहीं है, तो यह न केवल उनकी सोच की पराजय है बल्कि भारतीय लोकतंत्र की गरिमा के लिए भी खतरे की घंटी है।
यह बयान सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ नहीं, उस “भारतीयता” के खिलाफ है जो सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है।




