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डॉलर का बढ़ता पलायन बना चिंता का विषय: भारत का भुगतान संतुलन 30.8 अरब डॉलर के घाटे में, सरकार और RBI सतर्क

व्यापार | सुनील कुमार सिंह | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 मई 2026

विदेशी मुद्रा पर बढ़ा दबाव, छह गुना बढ़ा भुगतान संतुलन घाटा

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी सामने आई है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार देश का बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) 30.8 अरब डॉलर के घाटे में पहुंच गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि भारत से बाहर जाने वाली कुल विदेशी मुद्रा, देश में आने वाली विदेशी मुद्रा से 30.8 अरब डॉलर अधिक रही। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि यह घाटा पिछले वित्तीय वर्ष 2024-25 की तुलना में छह गुना से अधिक बढ़ गया है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2023-24 में भारत का भुगतान संतुलन अधिशेष में था, लेकिन केवल दो वर्षों के भीतर तस्वीर पूरी तरह बदल गई है।

RBI के ताजा आंकड़े यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि केंद्र सरकार और केंद्रीय बैंक लगातार जिस विदेशी मुद्रा बहिर्गमन को लेकर चिंता जता रहे थे, वह अब वास्तविक आर्थिक चुनौती का रूप ले चुका है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि डॉलर के बाहर जाने की यह गति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका सीधा असर रुपये की मजबूती, निवेश प्रवाह और देश की आर्थिक स्थिरता पर पड़ सकता है।

व्यापार घाटा और विदेशी निवेश में गिरावट बनी मुख्य वजह

RBI की रिपोर्ट बताती है कि भुगतान संतुलन में आए इस बड़े घाटे के पीछे दो प्रमुख कारण हैं—बढ़ता हुआ व्यापार घाटा और विदेशी निवेश में आई तेज गिरावट। भारत का आयात लगातार बढ़ रहा है जबकि निर्यात उसी गति से आगे नहीं बढ़ पा रहा। परिणामस्वरूप व्यापार संतुलन नकारात्मक होता जा रहा है। इसके साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) और वैश्विक निवेश फंडों का निवेश भी अपेक्षा से काफी कम रहा, जिससे विदेशी मुद्रा का प्रवाह कमजोर पड़ गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पूंजी निकालते हैं या नए निवेश से बचते हैं, तब डॉलर की उपलब्धता पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि चालू खाते (Current Account) और पूंजी खाते (Capital Account) दोनों पर दबाव बढ़ा है। यह स्थिति केवल वित्तीय आंकड़ों तक सीमित नहीं है बल्कि भविष्य की आर्थिक संभावनाओं को भी प्रभावित कर सकती है।

विदेशी मुद्रा भंडार के सहारे संभली स्थिति

रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पूरे वित्तीय वर्ष 2025-26 में उत्पन्न भुगतान संतुलन घाटे की भरपाई RBI को अपने विदेशी मुद्रा भंडार से करनी पड़ी। अर्थात देश में आने वाले डॉलर पर्याप्त नहीं थे और केंद्रीय बैंक को अपने रिज़र्व से डॉलर निकालकर इस अंतर को भरना पड़ा। इससे विदेशी मुद्रा भंडार में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।

हालांकि भारत अभी भी दुनिया के उन देशों में शामिल है जिनके पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, लेकिन लगातार ऐसे घाटों की भरपाई रिज़र्व से करना दीर्घकालिक समाधान नहीं माना जाता। अर्थशास्त्रियों के अनुसार विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा ढाल होता है और उसका लगातार क्षरण निवेशकों के विश्वास को प्रभावित कर सकता है।

सरकार और RBI की चिंता क्यों बढ़ी?

भारत वर्तमान में दुनिया की सबसे तेज़ी से विकसित होती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। लेकिन विकास की इस रफ्तार को बनाए रखने के लिए विदेशी निवेश, निर्यात वृद्धि और स्थिर विदेशी मुद्रा प्रवाह अत्यंत आवश्यक हैं। यदि डॉलर का बहिर्गमन लगातार बढ़ता रहा तो रुपये पर दबाव बढ़ेगा, आयात महंगे होंगे और महंगाई को नियंत्रित करना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

यही वजह है कि केंद्र सरकार पिछले कुछ समय से विदेशी निवेश आकर्षित करने, उत्पादन बढ़ाने और निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार नई नीतियां लागू कर रही है। “मेक इन इंडिया”, “उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI)”, विभिन्न मुक्त व्यापार समझौते (FTA) तथा वैश्विक कंपनियों को भारत में विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने के लिए दिए जा रहे प्रोत्साहन इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।

वैश्विक अस्थिरता ने भी बढ़ाई मुश्किलें

भारत की आर्थिक चुनौतियां केवल घरेलू कारणों तक सीमित नहीं हैं। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिका और यूरोप में ऊंची ब्याज दरें, वैश्विक व्यापार में सुस्ती तथा चीन सहित कई बड़े बाजारों की आर्थिक मंदी ने भी भारत के भुगतान संतुलन पर असर डाला है। निवेशक अनिश्चित परिस्थितियों में अपेक्षाकृत सुरक्षित बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं में पूंजी प्रवाह प्रभावित हुआ है।

इसके अतिरिक्त कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और ऊर्जा आयात पर भारत की भारी निर्भरता ने भी व्यापार घाटे को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल कीमतों में मामूली वृद्धि भी विदेशी मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव पैदा करती है।

आगे की राह: निर्यात और निवेश बढ़ाना होगी प्राथमिकता

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती विदेशी मुद्रा प्रवाह को मजबूत बनाना होगी। इसके लिए उच्च मूल्य वाले विनिर्माण क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करना, निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाना, सेवा क्षेत्र विशेषकर आईटी और डिजिटल सेवाओं का विस्तार करना तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना आवश्यक होगा।

भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, मजबूत सेवा क्षेत्र और युवा कार्यबल जैसी महत्वपूर्ण ताकतें मौजूद हैं। यदि इनका प्रभावी उपयोग किया जाए तो विदेशी निवेश और निर्यात दोनों में वृद्धि संभव है। हालांकि फिलहाल स्थिति किसी आर्थिक संकट जैसी नहीं है, लेकिन RBI की ताजा रिपोर्ट स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि डॉलर के बढ़ते बहिर्गमन को नियंत्रित करना आने वाले वर्षों में केंद्र सरकार और रिज़र्व बैंक की सबसे बड़ी आर्थिक प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा।

आर्थिक संकेतों को नजरअंदाज करना होगा महंगा

विश्लेषकों का मानना है कि भुगतान संतुलन में लगातार बढ़ता घाटा केवल एक वित्तीय आंकड़ा नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था की दिशा का महत्वपूर्ण संकेतक है। यदि समय रहते निर्यात, निवेश और विदेशी मुद्रा प्रवाह को मजबूत करने के कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर रुपये, महंगाई, रोजगार और आर्थिक विकास दर पर दिखाई दे सकता है। इसलिए RBI की यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं के लिए एक चेतावनी भी है और भविष्य की आर्थिक रणनीति तय करने का अवसर भी।

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