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ताइवान मुद्दे पर चीन का अमेरिका को कड़ा संदेश: बेहद सावधानी बरते वॉशिंगटन

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग | 29 मई 2026

ताइवान को हथियार बिक्री पर फिर भड़का चीन

चीन और अमेरिका के बीच ताइवान को लेकर तनाव एक बार फिर गहराता दिखाई दे रहा है। चीन के रक्षा मंत्रालय ने अमेरिका को कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि वॉशिंगटन को ताइवान के मुद्दे पर “अत्यंत सावधानी” बरतनी चाहिए। चीन ने साफ शब्दों में दोहराया कि ताइवान चीन का अभिन्न हिस्सा है और किसी भी विदेशी दखल को बीजिंग अपनी संप्रभुता के खिलाफ मानता है।

चीन के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता जियांग बिन ने बीजिंग में आयोजित नियमित प्रेस ब्रीफिंग के दौरान यह बयान दिया। यह प्रतिक्रिया उस खबर के बाद आई जिसमें कहा गया था कि अमेरिका ने ताइवान को प्रस्तावित 14 अरब डॉलर के हथियार सौदे को अस्थायी रूप से रोक दिया है, लेकिन साथ ही उसने अपने 2027 रक्षा बजट कानून में “ताइवान सिक्योरिटी कोऑपरेशन इनिशिएटिव” के तहत 1 अरब डॉलर शामिल किए हैं।

“वन चाइना पॉलिसी” का सम्मान करे अमेरिका

चीनी प्रवक्ता जियांग बिन ने कहा कि अमेरिका को “वन चाइना पॉलिसी” और चीन-अमेरिका के बीच हुए तीन संयुक्त समझौतों का पूरी तरह पालन करना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से 17 अगस्त 1982 के उस ऐतिहासिक समझौते का उल्लेख किया जिसमें अमेरिका ने ताइवान को हथियारों की बिक्री धीरे-धीरे कम करने और अंततः समाप्त करने की बात कही थी।

चीन ने आरोप लगाया कि अमेरिका अपने पुराने वादों और समझौतों से पीछे हट रहा है। बीजिंग का कहना है कि ताइवान को सैन्य सहायता देना न केवल चीन की क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ है बल्कि इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अस्थिरता भी बढ़ सकती है।

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चीन-अमेरिका रिश्तों पर बढ़ सकता है असर

विश्लेषकों का मानना है कि ताइवान मुद्दा चीन-अमेरिका संबंधों का सबसे संवेदनशील और विस्फोटक विषय बन चुका है। बीजिंग पहले भी कई बार चेतावनी दे चुका है कि यदि अमेरिका ताइवान को सैन्य समर्थन देना जारी रखता है तो दोनों देशों के रिश्तों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

चीन ने कहा कि अमेरिका को अपने बयानों और प्रतिबद्धताओं का सम्मान करना चाहिए तथा ऐसे कदम उठाने चाहिए जो चीन-अमेरिका संबंधों और सैन्य सहयोग को स्थिर, स्वस्थ और टिकाऊ बनाए रखें। हालांकि दूसरी ओर अमेरिका लगातार यह कहता रहा है कि वह ताइवान की सुरक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था के समर्थन के लिए प्रतिबद्ध है।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा

ताइवान को लेकर बढ़ता तनाव केवल चीन और अमेरिका तक सीमित नहीं है बल्कि इसका असर पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर पड़ रहा है। दक्षिण चीन सागर, इंडो-पैसिफिक रणनीति और अमेरिकी सैन्य गठबंधनों के कारण पहले ही क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो चुकी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ताइवान को चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के एक बड़े रणनीतिक उपकरण के रूप में देखता है, जबकि चीन इसे अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता का मूल प्रश्न मानता है। यही कारण है कि ताइवान को लेकर दोनों महाशक्तियों के बीच टकराव की आशंका लगातार बनी रहती है।

दुनिया की निगाहें बीजिंग और वॉशिंगटन पर

वैश्विक स्तर पर भी इस मुद्दे पर नजरें टिकी हुई हैं क्योंकि चीन और अमेरिका दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्तियां हैं। यदि ताइवान को लेकर तनाव और बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक व्यापार, टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

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फिलहाल चीन ने अमेरिका को साफ चेतावनी देते हुए कहा है कि ताइवान प्रश्न “रेड लाइन” है और इस मामले में किसी भी प्रकार की उकसावे वाली कार्रवाई स्वीकार नहीं की जाएगी। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि वॉशिंगटन अपनी नीति में कितना संतुलन बनाए रखता है और बीजिंग इस पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देता है।

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