ओपिनियन | शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 8 जून 2026
सोने की चमक के पीछे छिपा एक बड़ा सवाल : क्या राजेश एक्सपोर्ट्स विवाद भारत के निवेशकों के लिए एक बड़ी चेतावनी है?
भारत में जब भी आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है, महंगाई लोगों की जेब पर बोझ डालती है और बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ता है, तब आम आदमी सबसे पहले जिस चीज़ की तरफ भागता है, वह है सोना। भारतीय परिवारों के लिए सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि सुरक्षा, सम्मान और भविष्य की गारंटी माना जाता है। लेकिन आज जिस समय देश में सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही हैं और लोग बैंकों से पैसा निकालकर सोने में निवेश कर रहे हैं, उसी समय देश की सबसे बड़ी सोना कारोबारी कंपनियों में से एक, राजेश एक्सपोर्ट्स, गंभीर आरोपों के घेरे में है। यह केवल एक कंपनी की कहानी नहीं है, बल्कि उस भरोसे की कहानी है जिस पर करोड़ों भारतीय अपनी मेहनत की कमाई का भविष्य टिका कर रखते हैं।
15 लाख करोड़ रुपये का आरोप और बाजार में भूचाल
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने आरोप लगाया है कि राजेश एक्सपोर्ट्स ने वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच अपनी आय को लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि इसकी तुलना भारत के कुल वार्षिक बजट के एक बड़े हिस्से से की जा सकती है। कंपनी ने इन आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि यह उसकी विदेशी सहायक कंपनियों की आय को लेकर व्याख्या का विवाद है। मामला अभी जांच के अधीन है और अंतिम फैसला आना बाकी है। लेकिन जैसे ही सेबी ने अंतरिम आदेश जारी किया, शेयर बाजार में भारी घबराहट फैल गई और कंपनी के शेयर लगातार निचले सर्किट में फंसते चले गए।
यह विवाद अचानक नहीं, वर्षों से सुलग रही आग है
दिलचस्प बात यह है कि यह मामला एक दिन में पैदा नहीं हुआ। शिकायतें और सवाल कई वर्षों से मौजूद थे। जानकारी के अनुसार यह मामला 2024 से नियामकीय जांच के दायरे में था। लेकिन 3 जून 2026 को जब सेबी ने सार्वजनिक रूप से अपने निष्कर्षों की जानकारी दी, तब जाकर निवेशकों को स्थिति की गंभीरता का अंदाजा हुआ। नतीजा यह हुआ कि जिस शेयर को कभी निवेशकों ने सुनहरा अवसर समझा था, वही शेयर देखते-देखते भारी गिरावट का शिकार हो गया। इससे एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि क्या हमारे वित्तीय बाजारों में चेतावनी संकेतों को समय रहते पहचाना और साझा किया जाता है?
एलआईसी और लाखों छोटे निवेशकों का पैसा दांव पर
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसमें केवल निजी निवेशकों का पैसा नहीं लगा था। देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी LIC की राजेश एक्सपोर्ट्स में लगभग 10.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है। यानी करोड़ों पॉलिसीधारकों की बचत का एक हिस्सा भी इस कंपनी में निवेशित था। इसके अलावा करीब दो लाख छोटे निवेशकों ने भी इस कंपनी पर भरोसा करके अपनी पूंजी लगाई थी। जब किसी शेयर की कीमत कुछ वर्षों में 600 रुपये से गिरकर 100 रुपये के आसपास पहुंच जाती है, तो यह केवल बाजार का आंकड़ा नहीं होता, बल्कि लाखों परिवारों के सपनों, योजनाओं और बचत का नुकसान होता है।
बड़े निवेशक निकले, छोटे निवेशक फंस गए
राजेश एक्सपोर्ट्स की शेयरधारिता का रिकॉर्ड एक और दिलचस्प कहानी बताता है। मार्च 2023 में छोटे निवेशकों की हिस्सेदारी केवल 1.6 प्रतिशत थी, जबकि एनआरआई और विदेशी संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी बहुत अधिक थी। लेकिन अगले तीन वर्षों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। बड़े और अनुभवी निवेशकों ने धीरे-धीरे अपने शेयर बेचना शुरू कर दिए, जबकि छोटे निवेशकों ने कंपनी में अपना निवेश बढ़ा दिया। परिणाम यह हुआ कि जब तक आम निवेशक बड़ी संख्या में कंपनी में आए, तब तक शेयर की कीमत लगातार गिरती चली गई। मार्च 2023 से मार्च 2026 के बीच शेयर में लगभग 87 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि शेयर बाजार में अक्सर सबसे बड़ा जोखिम वही उठाता है जिसके पास सबसे कम जानकारी होती है।
सोना सुरक्षित है, लेकिन क्या सोने का कारोबार भी सुरक्षित है?
राजेश एक्सपोर्ट्स कभी भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक मानी जाती थी। इसे दुनिया की सबसे बड़ी सोना रिफाइनिंग और आभूषण निर्यात कंपनियों में गिना जाता था। लेकिन आज वही कंपनी कॉरपोरेट गवर्नेंस, लेखा प्रणाली और ऑडिट प्रक्रिया को लेकर सवालों में घिरी हुई है। इससे एक महत्वपूर्ण संदेश निकलता है—सोना स्वयं सुरक्षित निवेश हो सकता है, लेकिन सोने से जुड़ी हर कंपनी या हर निवेश सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं है। चमकदार उद्योगों के पीछे भी गंभीर जोखिम और कमियां छिपी हो सकती हैं।
शेयर बाजार का सपना और हकीकत का झटका
पिछले कुछ वर्षों में शेयर बाजार को तेजी से धन कमाने का माध्यम बताया गया। सोशल मीडिया पर सफलता की कहानियां दिखाई गईं, लेकिन वास्तविकता अक्सर अलग होती है। वित्त वर्ष 2022 से 2025 के बीच फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) कारोबार में दस में से नौ से अधिक खुदरा निवेशकों को नुकसान हुआ। सामूहिक रूप से निवेशकों ने लगभग 2.9 लाख करोड़ रुपये गंवाए। राजेश एक्सपोर्ट्स जैसी घटनाएं इस कड़वी सच्चाई को और मजबूत करती हैं कि शेयर बाजार अवसरों के साथ-साथ बड़े जोखिम भी लेकर आता है।
सोने की कीमतें आसमान पर, लेकिन सवाल भी बढ़ रहे हैं
इस पूरे घटनाक्रम को और रोचक बनाता है देश में चल रहा गोल्ड बूम। भारतीय रिजर्व बैंक के पास लगभग 880 टन से अधिक सोना है और विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। आम लोग भी सोने को सुरक्षित निवेश मानकर खरीदारी कर रहे हैं। लेकिन इसी दौरान रिजर्व बैंक के सोने के मूल्यांकन में एक सप्ताह के भीतर लगभग 46 हजार करोड़ रुपये की कमी दर्ज होने की खबरों ने भी कई सवाल खड़े किए। इससे यह स्पष्ट होता है कि सोना भले ही सुरक्षित संपत्ति माना जाए, लेकिन उससे जुड़ी आर्थिक और वित्तीय गतिविधियां हमेशा उतनी सरल नहीं होतीं जितनी दिखाई देती हैं।
बैंकों से दूर हो रहे हैं भारतीय परिवार
कुछ वर्षों पहले तक भारतीय परिवारों की पहली पसंद बैंक खाते और फिक्स्ड डिपॉजिट हुआ करते थे। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। बचत खातों की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। लोग बैंक जमा की बजाय म्यूचुअल फंड, शेयर, रियल एस्टेट और सोने की ओर बढ़ रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि महंगाई के मुकाबले बैंक जमा पर मिलने वाला वास्तविक लाभ लगातार कम होता जा रहा है। दूसरी ओर सोने की कीमतों में हुई तेज बढ़ोतरी ने लोगों को यह विश्वास दिलाया है कि उनकी पूंजी यहां अधिक सुरक्षित और लाभदायक रह सकती है।
क्या केवल सोना भारत का भविष्य बना सकता है?
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। कोई भी देश केवल सोना खरीदकर और तिजोरियों में जमा करके समृद्ध नहीं बन सकता। आर्थिक विकास तब होता है जब पैसा उद्योगों, कारखानों, नई तकनीक, स्टार्टअप, शिक्षा और रोजगार सृजन में लगाया जाए। यदि समाज की बड़ी पूंजी केवल निष्क्रिय संपत्तियों में बंद हो जाए तो आर्थिक गतिविधियों की गति धीमी पड़ सकती है। इसलिए सोना व्यक्तिगत सुरक्षा का माध्यम तो हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय आर्थिक विकास का विकल्प नहीं बन सकता।
राजेश एक्सपोर्ट्स का सबक: चमक और भरोसा हमेशा एक नहीं होते
राजेश एक्सपोर्ट्स विवाद केवल एक कंपनी पर लगे आरोपों की कहानी नहीं है। यह भारतीय निवेशकों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। यह हमें बताता है कि किसी कंपनी का बड़ा नाम, उसका लोकप्रिय उद्योग या उसके साथ जुड़े बड़े निवेशक भी पूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं होते। निवेश का सबसे बड़ा आधार हमेशा पारदर्शिता, जवाबदेही और मजबूत नियामकीय निगरानी होना चाहिए। सोने की चमक आज भी लोगों को आकर्षित करेगी, लेकिन इस विवाद ने साबित कर दिया है कि हर चमकती हुई चीज़ भरोसे के लायक नहीं होती। समझदारी इसी में है कि निवेश भावनाओं से नहीं, तथ्यों और सतर्कता के आधार पर किया जाए।




