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शार्क टैंक से शेयर बाजार तक: ‘अचानक मुनाफे’ की कहानी — क्या SEBI को अब सख्त नियम लाने होंगे?

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भारतीय स्टार्टअप जगत में IPO (Initial Public Offering) का ट्रेंड पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से बढ़ा है। लेकिन इस चमकदार सफ़र के पीछे एक चौंकाने वाला पैटर्न भी सामने आया है — कई बड़ी स्टार्टअप कंपनियाँ जो लगातार घाटे में चल रही थीं, उन्होंने IPO से ठीक एक साल पहले अचानक “मुनाफ़ा दिखाने” का चमत्कार कर दिया। Mama Earth, Lenskart, BoAt और Sugar Cosmetics जैसी चर्चित कंपनियाँ इसका ताज़ा उदाहरण हैं, जिनकी वित्तीय रिपोर्टिंग अब गंभीर सवालों के घेरे में है।

मामा अर्थ की मिसाल: घाटे से मुनाफे तक का ‘IPO चमत्कार’

Mama Earth ने लगातार तीन वर्षों तक घाटा झेला, लेकिन IPO से पहले वाले वित्तीय वर्ष में कंपनी अचानक मुनाफे में आ गई। ₹325 के ऑफर प्राइस पर लॉन्च हुई यह कंपनी अब ₹271 पर कारोबार कर रही है। निवेशकों के लिए यह एक चेतावनी है कि ‘IPO से पहले का मुनाफा’ क्या वास्तव में टिकाऊ है, या सिर्फ़ IPO वैल्यूएशन को बढ़ाने की एक रणनीति? वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियाँ अक्सर IPO से पहले खर्चों को घटाकर या एकमुश्त राजस्व दिखाकर “प्रॉफिटेबल” बनती दिखती हैं, जिससे निवेशकों को भ्रमित किया जा सके।

लेंसकार्ट और बोट की चाल: ‘टाइम्ड प्रॉफिट’ का खेल

Lenskart ने भी तीन साल के घाटे के बाद 2025 में अचानक मुनाफा दिखाया और IPO लाने की तैयारी में है। ठीक यही कहानी BoAt की भी है—कंपनी जो लंबे समय से नुकसान में थी, उसने इसी वर्ष पहली बार मुनाफा दर्ज किया और अब IPO लाने की योजना बना रही है। उद्योग जगत में इसे “प्री-IPO प्रॉफिटिंग” कहा जा रहा है — यानी IPO से पहले कृत्रिम रूप से बैलेंस शीट को आकर्षक बनाना।

शुगर कॉस्मेटिक्स भी लाइन में: 2026 का लक्ष्य, 2025 में मुनाफा दिखाने की तैयारी

Sugar Cosmetics, जो फिलहाल घाटे में चल रही है, उसने भी 2026 में IPO लाने की घोषणा की है। सूत्रों के अनुसार कंपनी 2025 तक अपने वित्तीय प्रदर्शन को “IPO-रेडी” बनाने में जुटी है। सवाल यह है कि क्या यह सब संयोग है, या फिर भारतीय स्टार्टअप्स में एक नया ट्रेंड बन गया है — “IPO से पहले का साल = चमत्कारी मुनाफा”?

SEBI के लिए चेतावनी: ‘शोबिज बिजनेस’ से पारदर्शिता की मांग

वित्त विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) को इस ट्रेंड पर तत्काल ध्यान देना चाहिए। IPO की अनुमति केवल उन कंपनियों को दी जानी चाहिए जो लगातार पाँच वर्षों तक लाभ में रही हों। ऐसा नियम निवेशकों के हितों की रक्षा करेगा और फर्जी ‘वित्तीय मेकअप’ पर लगाम लगाएगा। वर्तमान व्यवस्था में, कंपनियाँ एक साल के मुनाफे का हवाला देकर करोड़ों रुपये जुटा रही हैं, जबकि उनकी दीर्घकालिक स्थिरता पर गंभीर संदेह बना हुआ है।

विडंबना यह कि ये सभी ‘शार्क टैंक’ के गुरू हैं

दिलचस्प बात यह है कि Mama Earth, BoAt, Lenskart और Sugar Cosmetics के संस्थापक वही लोग हैं जो टीवी पर ‘शार्क टैंक इंडिया’ जैसे शो में बैठकर नए उद्यमियों को व्यवसायिक ईमानदारी और पारदर्शिता का पाठ पढ़ाते हैं। लेकिन जब बात खुद के व्यवसाय की आती है, तो वही कंपनियाँ IPO से पहले के एक साल में “अचानक मुनाफे” का खेल खेलती नज़र आती हैं। यह विडंबना भारतीय निवेशकों के लिए गहरी सोच का विषय है — क्या ये ‘शार्क’ वाकई पारदर्शिता के प्रतीक हैं, या फिर पूंजी बाज़ार के नए शिकारी?

 पारदर्शिता बनाम प्रचार

भारत की नई अर्थव्यवस्था में स्टार्टअप्स की भूमिका निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी पारदर्शिता और जवाबदेही उससे भी अधिक ज़रूरी है। अगर SEBI ने अब सख्त नियम नहीं बनाए, तो “शार्क टैंक” से निकलकर “मार्केट टैंक” में डूबने की आशंका सिर्फ़ निवेशकों की नहीं, बल्कि पूरी भारतीय स्टार्टअप इकोनॉमी की होगी।

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