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अन्न से आत्मनिर्भरता तक: आज़ादी के बाद भारत की कृषि क्रांति की स्वर्णिम तस्वीर

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आज़ादी के साथ शुरू हुई आत्मनिर्भर कृषि की नींव 1947 में आज़ादी के समय भारत एक कृषि प्रधान देश था, लेकिन खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर नहीं था। देश की 70% से अधिक जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी, परंतु उत्पादन इतना कम था कि भारत को अमेरिका की PL-480 स्कीम के तहत गेहूं मंगवाना पड़ता था। सिंचाई के साधन सीमित थे, बीज परंपरागत थे और कृषि व्यवस्था मानसून पर आधारित थी। इन चुनौतियों को देखते हुए भारत सरकार ने कृषि को प्राथमिकता दी और पंचवर्षीय योजनाओं से लेकर हरित क्रांति, तकनीकी नवाचार, किसान सशक्तिकरण और डिजिटल कृषि तक एक लंबी यात्रा शुरू हुई। स्वतंत्र भारत की कृषि विकास गाथा न केवल आत्मनिर्भरता की, बल्कि वैज्ञानिक, सामाजिक और वैश्विक पहचान की कहानी भी है।

प्रारंभिक अवस्था (1947–1965): आत्मनिर्भरता की तलाश स्वतंत्रता के बाद देश की प्रमुख चिंता खाद्य सुरक्षा थी। 1947 में देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन लगभग 50 मिलियन टन था। इस समय देश में खेती के लिए न तो पर्याप्त सिंचाई के साधन थे, न ही वैज्ञानिक तकनीक। भूमि सुधार, ज़मींदारी उन्मूलन और पंचायती राज जैसी योजनाएं लागू की गईं। 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना के तहत कृषि को विशेष प्राथमिकता दी गई। लेकिन सूखा, अकाल और जनसंख्या वृद्धि के चलते खाद्यान्न संकट बना रहा। कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना और कृषि अनुसंधान परिषद की नींव इन्हीं वर्षों में पड़ी, जिसने आगे चलकर भारतीय कृषि की वैज्ञानिक दिशा तय की।

हरित क्रांति का आगमन (1966–1980): उत्पादन में क्रांति भारत में कृषि का निर्णायक मोड़ 1966 से आया, जब हरित क्रांति (Green Revolution) की शुरुआत हुई। डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन और उनके सहयोगियों ने उच्च उपज वाली किस्मों (HYV), रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दिया। हरित क्रांति का सबसे बड़ा प्रभाव गेहूं और धान के उत्पादन पर पड़ा। 1978 तक भारत का खाद्यान्न उत्पादन 110 मिलियन टन हो गया। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इसके सबसे बड़े लाभार्थी बने। इससे भारत न केवल खाद्यान्न संकट से बाहर निकला बल्कि खाद्य आत्मनिर्भरता की ओर तेज़ी से बढ़ा। यह वह दौर था जब किसानों ने पहली बार देखा कि विज्ञान के सहयोग से उनकी मेहनत का फल दोगुना हो सकता है।

श्वेत क्रांति और ऑपरेशन फ्लड (1970–1990): दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भरता 1970 में डॉ. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में शुरू हुए ‘ऑपरेशन फ्लड’ ने भारत को विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बना दिया। इसे श्वेत क्रांति कहा गया। सहकारी समितियों के मॉडल ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। इसके साथ ही मछली पालन (नीली क्रांति), रेशम उत्पादन (स्वर्ण क्रांति), बागवानी (आलंकारिक क्रांति) में भी राज्यवार योजनाएं शुरू हुईं। 1950 में भारत का दुग्ध उत्पादन 17 मिलियन टन था, जो 1990 तक 50 मिलियन टन तक पहुँच गया। यह ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण, पशुपालन और विपणन प्रणाली के विकास का भी प्रतीक था।

कृषि अनुसंधान और संस्थागत ढांचे का विकास (1980–2000) 1980 के बाद भारत में कृषि अनुसंधान को संस्थागत रूप दिया गया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने कृषि वैज्ञानिकों को आधुनिक बीज, मृदा परीक्षण, रोग प्रतिरोधक किस्मों पर शोध के लिए प्लेटफॉर्म दिया। कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) ने किसानों को सीधे खेत स्तर पर तकनीक सिखाने का कार्य किया। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद कृषि में निवेश की नई राहें खुलीं। कृषि निर्यात को बढ़ावा मिला, जिससे किसानों को अधिक मूल्य मिलने लगा। महिला किसानों की भागीदारी बढ़ी और कृषि में यंत्रीकरण की गति तेज़ हुई। इसी काल में उद्यानिकी, फूलों की खेती और मूल्य संवर्धन की धारणा भी विकसित हुई।

21वीं सदी की शुरुआत (2000–2014): उदारीकरण से आत्मनिर्भरता की ओर 2000 के बाद भारत की कृषि नीति ने कई नए आयाम जोड़े। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (2007), राष्ट्रीय बागवानी मिशन, और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) लागू की गईं। वर्ष 2005 में शुरू हुई ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA)’ ने कृषि श्रमिकों को सुनिश्चित काम दिया। किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), और कृषि बीमा योजना ने किसानों की आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित की। 2004 में देश का खाद्यान्न उत्पादन 200 मिलियन टन के पार पहुंच गया। इस दौरान कृषि बाजारों के आधुनिकीकरण, बीज प्रमाणन और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास पर भी बल दिया गया।

2014 के बाद का दौर: डिजिटल भारत से स्मार्ट कृषि तक 2014 के बाद भारत सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने, कृषि लागत घटाने, और उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से अनेक योजनाएं लागू कीं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) के तहत 12 करोड़ से अधिक किसानों को ₹6,000 प्रति वर्ष सीधे DBT के तहत बैंक खाते में ट्रांसफर किया जा रहा है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, ई-नाम (e-NAM), किसान रेल और कृषि उड़ान योजना जैसी पहलों ने कृषि को व्यापक स्तर पर डिजिटल, पारदर्शी और लाभदायक बनाया है। इसके अलावा किसानों को संगठित करने के लिए FPO (Farmer Producer Organizations) का गठन और समर्थन एक क्रांतिकारी कदम रहा है, जिससे छोटे किसान भी बाजार से जुड़ पा रहे हैं।

कृषि में नवाचार और तकनीकी क्रांति (2020–2025) आधुनिक कृषि की ओर भारत ने पिछले 5 वर्षों में और अधिक तेज़ी से कदम बढ़ाया है। ड्रोन टेक्नोलॉजी का कृषि में प्रयोग अब सरकार द्वारा अनुमोदित हो चुका है। कीटनाशक छिड़काव, भूमि परीक्षण और निगरानी में इसका उपयोग बढ़ रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, IoT, GIS और सैटेलाइट इमेजिंग के जरिए फसल भविष्यवाणी, सिंचाई शेड्यूल और रोग रोकथाम को सटीक किया गया है। ‘डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन’ के तहत कृषि डाटा, मोबाइल ऐप, और ई-गवर्नेंस टूल्स को एकीकृत किया गया है। कृषि विश्वविद्यालयों और स्टार्टअप्स के माध्यम से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को तेज किया जा रहा है।

प्राकृतिक खेती और जैविक कृषि की ओर बढ़ता भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बार-बार जैविक और प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के बाद लाखों किसान अब रासायनिक उर्वरकों से हटकर देसी खाद और कीटनाशकों का उपयोग करने लगे हैं। सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती (SPNF) को हिमाचल, आंध्र और गुजरात जैसे राज्यों में लागू किया जा रहा है। सिक्किम पहला पूर्ण जैविक राज्य बन चुका है। NPOP (National Programme for Organic Production) और PKVY (Paramparagat Krishi Vikas Yojana) के तहत किसानों को प्रशिक्षण व सहायता दी जा रही है। इसके परिणामस्वरूप भारत के जैविक उत्पादों की मांग अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में तेज़ी से बढ़ रही है।

कृषि निर्यात और वैश्विक पहचान भारत 2021-22 में 50 बिलियन डॉलर से अधिक का कृषि निर्यात कर चुका है। चावल, गेहूं, मसाले, फल-सब्जियां, और समुद्री उत्पाद भारत के प्रमुख निर्यात उत्पाद बन चुके हैं। APEDA और MPEDA जैसी संस्थाएं अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय कृषि को सशक्त बना रही हैं। सरकार की ‘ब्रांड इंडिया’ पहल और GI टैग उत्पादों के माध्यम से भारतीय कृषि को वैश्विक बाज़ारों तक पहचान दिलाई जा रही है। इस रणनीति ने किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य सुनिश्चित किया है।

महिला किसान और सामाजिक समावेश ‘महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना (MKSP)’ से देश की 30% महिलाएं जो कृषि कार्यों में लगी थीं, अब अधिकारिक रूप से किसान के रूप में पंजीकृत हो रही हैं। महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा जैविक खेती, पशुपालन और फूलों की खेती के मॉडल देशभर में अपनाए जा रहे हैं। महिला किसानों के लिए क्रेडिट, प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच के विशेष कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। सामाजिक समावेश के अंतर्गत अनुसूचित जाति, जनजाति और सीमांत समुदायों के किसानों को विशेष समर्थन प्रदान किया जा रहा है।

भविष्य की ओर दृष्टि: 2047 तक का संकल्प भारत 2047 तक ‘विकसित राष्ट्र’ बनने के संकल्प में कृषि को केंद्र में रखकर काम कर रहा है। स्मार्ट और सतत कृषि, जल संरक्षण, कार्बन न्यूट्रल फार्मिंग और वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा के लिए विशेष रोडमैप बनाए जा रहे हैं। किसानों की आय बढ़ाने, कृषि लागत घटाने, और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप कृषि रणनीति बनाने पर ज़ोर है। किसान को अब ‘उपभोक्ता से उत्पादक’ और ‘आपूर्तिकर्ता से उद्यमी’ बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

निष्कर्ष: कृषि, आत्मा है भारत की आज जब भारत आज़ादी के 79वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है, तब यह गर्व से कहा जा सकता है कि हमने कृषि को केवल एक परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, तकनीकी और आर्थिक शक्ति के रूप में स्वीकार किया है। भारत की कृषि अब आत्मनिर्भर, नवाचारी, और विश्वव्यापी पहचान वाली बन चुकी है। आने वाले वर्षों में यही कृषि भारत को ‘विकसित राष्ट्र’ की ओर ले जाएगी — यही हमारा राष्ट्रीय संकल्प होना चाहिए।

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