सुमन कुमार । नई दिल्ली 30 नवंबर 2025
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा महात्मा गांधी के विचारों को “ग़लत” बताने वाला ताज़ा बयान एक बार फिर देश की राजनीतिक और वैचारिक बहस को उबाल पर ले आया है। नागपुर में हुए एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा था कि “गांधीजी का यह कहना कि भारतीय ब्रिटिश शासन से पहले एकजुट नहीं थे—यह पूरी तरह से गलत है।” यह टिप्पणी केवल ऐतिहासिक बहस का हिस्सा नहीं, उस बड़ी वैचारिक लड़ाई की नई कड़ी मानी जा रही है जिसमें गांधी, नेहरू, अंबेडकर और संविधान की मूल भावना को चुनौती देने की कोशिशों को विपक्ष लगातार निशाने पर लेता रहा है।
इस बयान का समय भी राजनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण है। कांग्रेस संसद जयराम रमेश निभाया है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी की संख्या घटकर 240 सीटों तक सिमटी है, और इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार आरएसएस के प्रति अधिक सम्मान, पहुंच और मेलजोल प्रदर्शित करते दिखाई दे रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि जब प्रधानमंत्री संगठन को साधने में पीछे नहीं हट रहे, तब आरएसएस प्रमुख इससे दो कदम आगे बढ़कर गांधी, नेहरू और अंबेडकर जैसे राष्ट्रीय स्तंभों की विरासत पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रहार कर रहे हैं—मानो इतिहास को नए सिरे से लिखने की एक संगठित मुहिम चल रही हो। आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ बयान नहीं, बल्कि उस वैचारिक पुनर्निर्माण का हिस्सा है, जिसमें भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और संवैधानिक दर्शन को खारिज करने की दीर्घकालिक कोशिशें शामिल हैं।
लेकिन इस विवाद का दूसरा और सबसे चिंताजनक पहलू है—देश के मीडिया और बौद्धिक जगत की चुप्पी। लेखक, पत्रकार, कवि, प्रोफ़ेसर और कुलपति जैसे बौद्धिक वर्गों से हमेशा लोकतंत्र की रक्षा की उम्मीद की जाती है, लेकिन आज वे आवाज़ उठाने के बजाय “मौन” की राजनीति में उलझे दिखाई दे रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि भारत में हजारों मीडिया संस्थान हैं, लाखों पत्रकार हैं, पर आरएसएस के विचारों और उसके वैचारिक आक्रमणों का विरोध करने वाले स्वर तेजी से कम होते जा रहे हैं। जिस पत्रकारिता को कभी सत्ता से सवाल पूछने की जनतांत्रिक शक्ति माना जाता था, वही पत्रकारिता आज पुरस्कारों, पदों, संस्थागत पदनामों और राजनीतिक लाभों की दौड़ में अपने विवेक को नागपुर के हवाले कर चुकी है।
हिंदी साहित्य और पत्रकारिता जगत की स्थिति पर भी प्रश्नचिह्न खड़े किए जा रहे हैं। देश के बड़े कवि-लेखक अख़बारों में साहित्यिक लेखन तक सीमित हो गए हैं, लेकिन आरएसएस के वैचारिक प्रभाव पर ठोस आलोचना से बच रहे हैं। सवाल यह है कि गांधी, नेहरू, टैगोर, प्रेमचंद और अम्बेडकर की बौद्धिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाले हिंदी लेखकों में कितने लोग आज साहसपूर्वक संघ के बयानों का प्रतिवाद कर रहे हैं? कितने साहित्यकार यह कहने को तैयार हैं कि इतिहास को तोड़ना, सामाजिक वास्तविकताओं को झुठलाना और संविधान की आत्मा पर चोट करना लोकतंत्र के लिए सीधा खतरा है?
इस बहस का सबसे संवेदनशील पहलू वह चेतावनी है जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है—कि अगर गांधी पर हमले जारी रहेंगे, नेहरू और अंबेडकर को बार-बार बदनाम किया जाएगा, तो वह दिन दूर नहीं जब नाथूराम गोडसे को भी “राष्ट्र निर्माता” की तरह पेश करने का अभियान तेज हो जाए। आलोचकों ने व्यंग्यात्मक लेकिन गंभीर सवाल उठाया है—“जब गांधी पर हमले करके लोग विधायक, सांसद और मंत्री बन सकते हैं, तो गोडसे को भारत रत्न देने से आखिर कौन रोकेगा?” यह चेतावनी अतिशयोक्ति जरूर लग सकती है, लेकिन सामाजिक-राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह चिंता अब केवल विचार नहीं, बल्कि एक वास्तविक आशंका के रूप में सामने आ रही है।
भागवत के बयान ने केवल राजनीतिक विवाद नहीं पैदा किया है, बल्कि एक बहुत गहरी वैचारिक खाई को फिर से उजागर किया है—वह खाई जिसमें एक ओर राष्ट्र की संवैधानिक और स्वतंत्रता संग्राम की विरासत है, और दूसरी ओर वह वैचारिक धारा जो इस विरासत को “गलत, भ्रामक और अप्रासंगिक” बताने में लगी है। सवाल यह नहीं कि गांधी सही थे या गलत; सवाल यह है कि क्या सत्ता और संगठन अपने हितों के अनुसार देश का इतिहास बदलने का लाइसेंस हासिल कर चुके हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या भारतीय समाज के भीतर अभी भी इतनी चेतना बची है कि वह इस ऐतिहासिक आक्रमण का मुकाबला कर सके?
आज सबसे बड़ा संकट राजनीतिक नहीं, बल्कि बौद्धिक है। और इस संकट का सामना तभी संभव होगा, जब देश का पत्रकार, लेखक, शिक्षक और युवा फिर से बोलने की हिम्मत जुटाए—क्योंकि चुप्पी हमेशा सत्ता को मजबूत बनाती है, लेकिन लोकतंत्र को कमजोर करती है।





