जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के बाहरी इलाक़े में स्थित Nowgam पुलिस स्टेशन में सोमवार देर रात हुआ भयानक विस्फोट भारत की सुरक्षा प्रणाली के लिए एक ऐसा झटका साबित हुआ है, जिसने न केवल आतंक-निरोधक तंत्र की क्षमता पर सवाल उठाए हैं बल्कि यह भी दिखा दिया है कि जब्त किये गए विस्फोटक सामग्री की सुरक्षा व्यवस्था में कितनी गंभीर चूकें मौजूद हैं। यह विस्फोट किसी आतंकी हमले का नतीजा नहीं था — बल्कि वह विस्फोट उसी धमाकेदार सामग्री से हुआ जो फरीदाबाद से जब्त की गई थी और जिसे जांच और परीक्षण के लिए कथित तौर पर सुरक्षित ढंग से पुलिस स्टेशन के भीतर रखा गया था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, फरीदाबाद में पकड़े गए एक संदिग्ध नेटवर्क से सैकड़ों किलो विस्फोटक-ग्रेड रसायन जब्त किए गए थे जिनमें अमोनियम नाइट्रेट, सल्फर और अन्य केमिकल शामिल थे। इन रसायनों को जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा विस्तृत जांच के लिए Nowgam पुलिस स्टेशन लाया गया था। लेकिन परीक्षण की प्रक्रिया के दौरान, एक रासायनिक प्रतिक्रिया हुई और देखते ही देखते सामग्री ने खुद को एक विशाल विस्फोट में तब्दील कर लिया। इस धमाके की तीव्रता इतनी अधिक थी कि थाने का बड़ा हिस्सा ध्वस्त हो गया, आसपास के घरों की खिड़कियाँ टूट गईं और पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई।
विस्फोट में कम-से-कम 9 लोगों की मौत हुई और दर्जनों लोग घायल हुए, जिनमें कई पुलिसकर्मी और फोरेंसिक अधिकारी शामिल हैं। चश्मदीदों के अनुसार, विस्फोट की आवाज़ किसी बम धमाके से कम नहीं थी—और थाने की दीवारों पर पड़े गहरे निशान यह साबित करते हैं कि यह घटना सामान्य परीक्षण ग़लती का परिणाम नहीं लगती। विशेषज्ञ अब इस पर सवाल उठा रहे हैं कि इतनी संवेदनशील जब्ती को आखिर किन परिस्थितियों में एक स्थानीय पुलिस स्टेशन के भीतर संग्रहित किया गया था और क्या सुरक्षा प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन किया गया था।
यह मामला तभी और गंभीर हो जाता है जब यह सामने आता है कि फरीदाबाद से जब्त की गई सामग्री एक बड़े व्हाइट-कॉलर आतंक मॉड्यूल की जांच का हिस्सा थी, जिसमें कथित तौर पर ऐसे लोगों की भूमिका सामने आई जिनका संबंध आतंकी संगठनों जैसे Jaish-e-Mohammed और Ansar Ghazwat-ul-Hind से जुड़ा बताया गया था। जब्त सामग्री का कुल वजन हजारों किलो में था और इनमें रसायन शामिल थे जो थोड़ी सी लापरवाही में भी विस्फोटक प्रतिक्रिया दे सकते थे। सवाल यह है कि ऐसी सामग्री को उच्च सुरक्षा वाले बंकर, नियंत्रित तापमान वाले परीक्षण प्रयोगशालाओं या स्पेशल स्टोरेज की बजाय एक आम पुलिस स्टेशन में क्यों रखा गया?
सुरक्षा विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों का कहना है कि यह घटना सिर्फ दुर्घटना नहीं — बल्कि प्रोटोकॉल फेलियर और प्रशासनिक गैर-जिम्मेदारी का सबसे बड़ा उदाहरण है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने टिप्पणी की — “यह सिर्फ ड्यूटी की चूक नहीं, बल्कि वह स्थिति है जहाँ राज्य ने खुद अपनी सुरक्षा को जोखिम में डाल दिया।”
पूरी घटना का एक और खतरनाक पहलू यह है कि Nowgam थाना पहले से ही उस जांच का केंद्र था जिसमें बुनपोरा क्षेत्र में लगे आतंक-समर्थक पोस्टरों के बाद दर्ज मामला तेज़ी से खुलासा कर रहा था। सीसीटीवी फुटेज ने तीन संदिग्धों की पहचान की थी और फरीदाबाद का लिंक इसी नेटवर्क के माध्यम से सामने आया था। इस वजह से पुलिस स्टेशन पहले ही जांच के लिए एक संवेदनशील केंद्र बन चुका था—ऐसे में वहां विस्फोटक सामग्री रखना और भी खतरनाक साबित हुआ।
घटना के बाद केंद्र और राज्य सुरक्षा एजेंसियों में हलचल मच गई है, और अब इस बात की उच्चस्तरीय जांच की जा रही है कि आखिर कौन से सुरक्षा नियमों का उल्लंघन हुआ, किसने इसकी अनुमति दी और क्या यह हादसा वास्तव में दुर्घटना था या किसी सुनियोजित व्यवस्था-तोड़ कार्रवाई का नतीजा।
जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ऐसी घटना का होना इस बात का प्रतीक है कि सुरक्षा तंत्र में मौजूद कमजोरियां कितनी बड़ी त्रासदी का कारण बन सकती हैं। यह घटना सिर्फ एक पुलिस थाने का हादसा नहीं — यह पूरे सुरक्षा ढांचे को आगाह करने वाला संदेश है कि जब विस्फोटक ‘सबूत’ ही सब कुछ उड़ा दें, तो प्रणाली की जड़ें कितनी खोखली हैं।




