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Epstein Files: 2017 की मोदी की विदेश यात्राओं पर संगीन सवाल, कांग्रेस बोली—शर्मनाक, धमकी नहीं जवाब चाहिए

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एबीसी नेशनल न्यूज | 1 फरवरी 2026 वाशिंगटन / नई दिल्ली

देश की राजनीति में एक बार फिर ज़ोरदार बहस छिड़ गई है। इस बार चर्चा के केंद्र में हैं तथाकथित Epstein Files, जिनसे जुड़े कुछ कथित ई-मेल और सोशल मीडिया पर वायरल दावे। इन दावों में प्रधानमंत्री Narendra Modi का नाम आने के बाद विपक्ष ने सरकार से सीधे और साफ जवाब की मांग की है। विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री के 2017 के विदेश दौरों, खासकर इज़राइल यात्रा के दौरान उनका सार्वजनिक आचरण और कार्यक्रमों की प्रकृति प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुरूप नहीं थी। सत्तापक्ष इन आरोपों को पूरी तरह निराधार, भ्रामक और राजनीति से प्रेरित बताते हुए खारिज कर रहा है।

विवाद की पृष्ठभूमि साल 2017 से जोड़ी जा रही है। उस वर्ष जून महीने में प्रधानमंत्री अमेरिका के दौरे पर थे, जहां उनकी मुलाकात तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump से हुई थी। इसके तुरंत बाद 4 से 6 जुलाई 2017 के बीच प्रधानमंत्री इज़राइल के आधिकारिक दौरे पर गए। यह दौरा ऐतिहासिक माना गया था क्योंकि यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली औपचारिक इज़राइल यात्रा थी। अब इसी इज़राइल दौरे को लेकर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। वायरल दावों और कथित ई-मेल के हवाले से विपक्ष यह सवाल उठा रहा है कि क्या प्रधानमंत्री ने वहां ऐसे कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, जिनमें उनका “गाना-बजाना और नाचना” भारत के प्रधानमंत्री के पद के अनुरूप नहीं था। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अगर ये दावे पूरी तरह झूठे हैं, तो सरकार को साफ-साफ बताना चाहिए कि प्रधानमंत्री ने वहां किन परिस्थितियों में, किस तरह के कार्यक्रमों में भाग लिया और उन आयोजनों की योजना किसने बनाई।

इस पूरे विवाद की जड़ 9 जुलाई 2017 की तारीख वाला एक कथित ई-मेल बताया जा रहा है, जिसे अमेरिकी फाइनेंसर Jeffrey Epstein से जोड़ा जा रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इस ई-मेल की एक पंक्ति में दावा किया गया है कि “भारतीय प्रधानमंत्री ने सलाह लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति के फायदे के लिए इज़राइल में कार्यक्रम किए—और यह काम कर गया।” विपक्ष का कहना है कि इसी कथन के साथ प्रधानमंत्री के कथित तौर पर इज़राइल में “गाने-नाचने” की बात जोड़कर देखा जा रहा है, जो भारत की विदेश नीति और प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर सवाल खड़े करता है।

कांग्रेस की ओर से इस मामले पर लगातार तीखी प्रतिक्रिया दी जा रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और मीडिया विभाग के प्रमुख Pawan Khera ने कहा कि सरकार हर बार असली मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। पवन खेड़ा ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि प्रधानमंत्री ने Epstein की सलाह ली या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि इज़राइल में इस तरह के कार्यक्रम किसके कहने पर और किस उद्देश्य से किए गए। उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री का पद कोई निजी मंच नहीं है। वहां हर कदम देश की छवि से जुड़ा होता है। धमकी देने से नहीं, जवाब देने से सच्चाई सामने आएगी।”

इससे पहले कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता Supriya Shrinate भी इस मुद्दे पर सरकार से स्पष्टीकरण मांग चुकी हैं। उन्होंने कहा था कि बच्चों के यौन शोषण और मानव तस्करी जैसे गंभीर अपराधों के आरोप झेल चुके व्यक्ति के कथित ई-मेल में प्रधानमंत्री का नाम आना और उसके साथ इस तरह के आचरण के आरोप जुड़ना देश की छवि के लिए बेहद गंभीर मामला है। उन्होंने मांग की कि प्रधानमंत्री स्वयं सामने आकर यह स्पष्ट करें कि इज़राइल दौरे के दौरान उनका सार्वजनिक आचरण क्या था और उस पर उठ रहे सवालों में कितनी सच्चाई है।

बीजेपी की तरफ से प्रवक्ता Sambit Patra ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री ने Epstein की कोई सलाह नहीं ली और कांग्रेस बेबुनियाद आरोप लगाकर देश को बदनाम करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि इज़राइल दौरा पूरी तरह आधिकारिक था और उसमें शामिल सभी कार्यक्रम कूटनीतिक शिष्टाचार के दायरे में थे। हालांकि, विपक्ष का कहना है कि यह सफाई अधूरी है, क्योंकि इससे मूल सवाल अनुत्तरित रह जाता है—अगर Epstein नहीं, तो फिर किसकी सलाह पर और किस प्रक्रिया के तहत ऐसे कार्यक्रम तय किए गए, जिन पर आज सवाल उठ रहे हैं।

सरकार समर्थकों और कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि किसी कथित ई-मेल में नाम आ जाने या सोशल मीडिया पर वायरल आरोपों से न तो कोई रिश्ता साबित होता है और न ही कोई अपराध। उनका कहना है कि 2017 की सभी विदेश यात्राएं पूरी तरह आधिकारिक थीं और उनके एजेंडे, बैठकें और नतीजे सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं। भारत-अमेरिका और भारत-इज़राइल संबंधों में उस समय जो मजबूती आई, वह वर्षों की कूटनीतिक तैयारी और रणनीतिक हितों का नतीजा थी।

Epstein Files से जुड़ा यह विवाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रहा है कि सोशल मीडिया पर वायरल दावों, कथित ई-मेल और ठोस, सत्यापित तथ्यों के बीच फर्क कैसे किया जाए। जनता के सामने सवाल हैं, विपक्ष जवाब मांग रहा है, लेकिन अंतिम सच्चाई तभी सामने आएगी जब आधिकारिक जांच, प्रमाण और पूरा संदर्भ सार्वजनिक होगा। तब तक यह मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और सार्वजनिक बहस के केंद्र में बना रहेगा।

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