महेंद्र सिंह | नई दिल्ली 21 अक्टूबर 2025
मोदी सरकार का सबसे शर्मनाक और खतरनाक Terror Cover-Up अब एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। 2020 में गिरफ्तार किया गया जम्मू-कश्मीर पुलिस का DSP देविंदर सिंह, जो Hizbul Mujahideen के आतंकियों को अपनी सरकारी गाड़ी में ले जाते हुए पकड़ा गया था, भारत की सुरक्षा व्यवस्था में छिपे गहरे सड़े हुए तंत्र की ओर इशारा करता है। उस समय पूरा देश स्तब्ध था, और उम्मीद थी कि यह गिरफ्तारी सुरक्षा एजेंसियों और आतंकवाद-रोधी तंत्र में बैठे गद्दारों का पर्दाफाश करेगी। लेकिन 2025 में यह केस भारत के सबसे विवादास्पद, दबा दिए गए और भुला दिए गए आतंक मामलों में बदल चुका है—सरकार की जानबूझकर की गई चुप्पी इसे और संदिग्ध बनाती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि देविंदर सिंह सिर्फ आतंकियों का ड्राइवर था या हमलों का योजनाकार? उसके खिलाफ आरोप छोटे नहीं थे—हिज़बुल के टॉप कमांडरों के साथ यात्रा, सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराना, हथियारों की सप्लाई और कई संदिग्ध ऑपरेशन। अफज़ल गुरु ने भी संसद हमले के मामले में सीधे अदालत में देविंदर सिंह का नाम लिया था, लेकिन मोदी सरकार ने न इन आरोपों की कभी पुष्टि की और न ही जांच बैठाई। इससे सवाल उठता है कि कहीं सरकार सच को इसलिए नहीं दबा रही क्योंकि इससे सुरक्षा तंत्र और राजनीतिक संरक्षण की काली परतें खुल जाएंगी?
सरकार की कार्यशैली पर सबसे बड़ा धब्बा यह है कि NIA की जांच 2021 से ठप पड़ी है। न कोई चार्जशीट आगे बढ़ी, न सुनवाई हुई, और आज, 2025 में, यह तक नहीं पता कि देविंदर सिंह कहाँ है—जमानत पर बाहर, कहीं गायब या सरकार का ‘अनकहा एसेट’? ऐसी अपारदर्शिता आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई को खोखला दिखाती है।
इस मामले का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि क्या सुरक्षा एजेंसियों या सरकार के भीतर ऐसे लोग थे जो देविंदर सिंह को बचा रहे थे? इतनी लंबी अवधि तक उसकी गतिविधियों पर पर्दा डाल पाना, उसके साथियों का कभी न पकड़ा जाना, और उसकी संलिप्तता के हर पहलू को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर दबा देना—ये सब संकेत देते हैं कि यह मामला सिर्फ एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का नहीं, बल्कि एक नेटवर्क का हिस्सा है।
पुराने रिकॉर्ड बताती हैं कि देविंदर सिंह पर 2003 के एक्सटॉर्शन केस, 2000 के अपहरण जैसे गंभीर आरोप थे—लेकिन सभी फाइलें बंद कर दी गईं। अफज़ल गुरु ने संसद हमले में उसकी भूमिका पर सवाल उठाए, लेकिन मोदी सरकार ने उन बयानों पर एक शब्द नहीं बोला। इससे साफ है कि सरकार इस मामले को उजागर करने से ज्यादा उसे दफनाने में दिलचस्पी रखती थी।
जब देश 2025 में दिल्ली ब्लास्ट से लेकर कश्मीर की अस्थिरता तक नई चुनौतियों से जूझ रहा है, तब DSP देविंदर सिंह जैसा केस यह बताता है कि भारत में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को सरकार प्रचार और इवेंट मैनेजमेंट की तरह चलाती है, सिस्टम में बैठे गद्दारों पर नहीं। एक ऐसे समय में जब पाकिस्तान-चीन की आक्रामकता और उनके गठजोड़ को लेकर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें सवाल उठा रही हैं, भारत की सुरक्षा व्यवस्था के भीतर के छेद और भी खतरनाक हो जाते हैं।
विपक्ष का सीधा सवाल है—क्या मोदी सरकार आतंकवाद से लड़ रही है, या आतंकवाद को ढक रही है? क्योंकि DSP देविंदर सिंह केस साबित करता है कि सरकार जहाँ सच्चाई असहज हो, वहाँ वह कार्रवाई नहीं, कवर-अप चुनती है।





