अंतरराष्ट्रीय डेस्क 6 दिसंबर 2025
यूक्रेन के चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट पर बने आधुनिक सुरक्षा कवच को ड्रोन हमले से हुई क्षति ने दुनिया को एक बार फिर 1986 की भयावह परमाणु त्रासदी की याद दिला दी है। इंटरनेशनल अटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) की ताज़ा जांच में यह साफ हो गया है कि रिएक्टर नंबर चार के ऊपर बना अरबों डॉलर की लागत से तैयार “न्यू सेफ कन्फाइनमेंट” (एनएससी) अब अपनी सबसे मूल जिम्मेदारी, यानी रेडिएशन को पूरी तरह रोकने और भीतर कैद रखने का काम पहले जैसा प्रभावी तरीक़े से नहीं कर पा रहा है। यूक्रेन का आरोप है कि 14 फ़रवरी 2025 की रात भारी विस्फोटकों से लैस ड्रोन रूस की ओर से दागा गया, जिसने इस कवच पर वार किया, आग लगाई और संरचना को ऐसा नुकसान पहुंचाया कि अब उसके दीर्घकालिक सुरक्षा मानकों पर बड़ी बहस खड़ी हो गई है।
चेर्नोबिल परिसर की संवेदनशीलता कोई नई बात नहीं है। कीव से करीब 130 किलोमीटर दूर और बेलारूस सीमा से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस प्लांट का निर्माण सोवियत संघ के दौर में हुआ था और यहां चार न्यूक्लियर रिएक्टर “आरबीएमके” डिजाइन पर बनाए गए थे, जिनमें ग्रैफाइट मॉडरेटर का इस्तेमाल होता था। 1970 से 1983 के बीच चारों यूनिट तैयार हुईं, लेकिन 26 अप्रैल 1986 की रात रिएक्टर नंबर चार में हुए दो ज़बरदस्त धमाकों ने इसे इतिहास की सबसे बड़ी परमाणु दुर्घटनाओं में बदल दिया। रिएक्टर का कोर और छत नष्ट हो गए, हजारों टन रेडियोएक्टिव मलबा वातावरण में फैल गया और करीब 10 दिन तक रेडिएशन का रिसाव जारी रहा। इस हादसे के प्रभाव से यूक्रेन, बेलारूस और रूस के बड़े हिस्से दूषित हुए, लाखों लोग विस्थापित हुए और अनुमान के मुताबिक कैंसर सहित अन्य बीमारियों से मौतों का आंकड़ा हजारों में जा पहुंचा।
दुर्घटना के तुरंत बाद सोवियत शासन ने चेर्नोबिल के चौथे रिएक्टर के ऊपर कंक्रीट और स्टील का एक विशाल ढांचा खड़ा किया, जिसे “सरकॉफगस” कहा गया। इसका उद्देश्य था रेडियोएक्टिव पदार्थ को किसी तरह बंद कर देना, लेकिन इसकी उम्र केवल करीब 30 साल आँकी गई थी। सोवियत संघ के विघटन के बाद 1997 में “शेल्टर इंप्लिमेंटेशन प्लान” लाकर स्थायी समाधान की योजना बनी और 2010 में नए कवच यानी “न्यू सेफ कन्फाइनमेंट” (एनएससी) का निर्माण शुरू हुआ। लगभग दो दशक की योजना, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और 1.75 अरब डॉलर से ज़्यादा की लागत के बाद 2017 में यह आधुनिक, गुंबदनुमा ढांचा तैयार हुआ, जिसे इस तरह डिजाइन किया गया था कि कम से कम 100 साल तक रेडिएशन को रोक सके, चरम मौसम और संरचनात्मक जोखिमों से प्लांट को बचा सके और भीतर जमा रेडियोएक्टिव मलबा सुरक्षित रूप से सील रहे।
लेकिन 14 फरवरी 2025 की रात दो बजे के करीब हुआ ड्रोन हमला उसी सुरक्षा मॉडल पर गहरा सवाल बनकर सामने आया। संयुक्त राष्ट्र और आईएईए के अनुसार, ड्रोन पर भारी विस्फोटक लगे थे, जिनकी टक्कर से रिएक्टर संख्या चार के ऊपर बना रक्षात्मक ढांचा आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया और आसपास आग लग गई, जिसे बाद में बुझा लिया गया। शुरुआती जांच में आईएईए ने बताया था कि प्लांट के भीतर और बाहर रेडिएशन स्तर “सामान्य सीमा” में पाए गए, जिससे तत्काल बड़े रिसाव की आशंका को खारिज किया जा सका। लेकिन तकनीकी विशेषज्ञों के मन में यह चिंता बनी रही कि कवच के बाहरी हिस्से में हुई दरारें और क्षति भविष्य में क्या ख़तरे पैदा कर सकती हैं—खासतौर पर तब, जब बारिश का पानी, नमी या अन्य बाहरी तत्व इस सरकॉफगस के भीतर जंग और संरचनात्मक कमजोरी की प्रक्रिया तेज कर दें।
चेर्नोबिल के रिएक्टर नंबर चार के नीचे आज भी भारी मात्रा में रेडियोएक्टिव मलबा कैद है—सिर्फ न्यूक्लियर फ्यूल ही नहीं, बल्कि 1986 की दुर्घटना के बाद आग को काबू करने के लिए हेलिकॉप्टरों से गिराए गए हजारों टन रेत, लेड, बोरिक एसिड और अन्य पदार्थ भी वहीं जमा हैं। इसीलिए एनएससी को सिर्फ एक ढांचा नहीं, बल्कि मानव इतिहास की सबसे जोखिम भरी “कंक्रीट कैप्सूल” में से एक माना जाता है। ड्रोन हमले के बाद यह आशंका जताई गई कि यदि कवच की “कन्फाइनमेंट क्षमता” कमजोर हुई तो इन रेडियोएक्टिव पदार्थों के वातावरण में जाने का खतरा बढ़ सकता है। साथ ही, यदि बारिश का पानी या नमी अंदर तक पहुँचती रही, तो भीतर मौजूद धातु और संरचनाओं में जंग के कारण भविष्य में ढांचे की स्थिरता और दीर्घकालिक सुरक्षा पर और भी गंभीर असर पड़ सकता है।
अब, घटना के करीब दस महीने बाद आईएईए की विस्तृत समीक्षा ने इन आशंकाओं को तकनीकी आधार दे दिया है। एजेंसी के महानिदेशक राफाएल गोसी ने अपने बयान में स्वीकार किया कि निगरानी दल की रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षा कवच ने अपनी “प्रमुख सुरक्षा क्षमता” का हिस्सा खो दिया है, जिसमें इसकी कन्फाइनमेंट यानी रेडिएशन रोकने की क्षमता भी शामिल है। हालांकि साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि संरचना की नींव और मॉनिटरिंग सिस्टम को कोई स्थायी नुकसान नहीं हुआ है और मरम्मत का एक हिस्सा पहले ही किया जा चुका है। फिर भी आईएईए का कहना है कि दीर्घकालिक न्यूक्लियर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक और बड़े पैमाने की मरम्मत तत्काल ज़रूरी है, ताकि ढांचे को आगे किसी भी तरह की क्षति या रिसाव के जोखिम से बचाया जा सके।
इस पूरे घटनाक्रम ने यूक्रेन युद्ध के एक और बेहद खतरनाक आयाम की ओर ध्यान खींचा है—न्यूक्लियर स्थलों की सैन्य जंग के बीच सुरक्षा। चेर्नोबिल जैसे स्थल, जहां पहले ही इतिहास की सबसे भयावह परमाणु त्रासदी हो चुकी है, यदि दुबारा सैन्य लक्ष्य बनने लगें, तो इसका असर केवल यूक्रेन या रूस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे यूरोप और संभवतः दुनिया भर के पर्यावरण व स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। चेर्नोबिल हादसे के बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी सहित कई अध्ययनों ने बताया था कि लगभग 20,000 वर्ग मील क्षेत्र दूषित हुआ और रेडियोएक्टिव प्लूम यूरोप के बड़े हिस्सों तक फैला। ऐसे में, उसी स्थल पर बने नए सुरक्षा कवच के कमजोर पड़ने की खबर वैश्विक चिंता का विषय बनना स्वाभाविक है।
आईएईए की रिपोर्ट से साफ है कि फिलहाल तत्काल कोई बड़े पैमाने का रेडिएशन रिसाव नहीं हो रहा, लेकिन “सुरक्षा के आख़िरी कवच” के चोटिल होने का मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय, यूक्रेन और संबंधित संस्थानों को मिलकर जल्द से जल्द एनएससी की व्यापक मरम्मत और सुरक्षा अपग्रेड सुनिश्चित करना होगा। वरना, युद्ध के बीच एक और “परमाणु जोखिम” सिर्फ कागज़ी रिपोर्ट से निकलकर वास्तविक खतरे में बदल सकता है—और दुनिया को एक बार फिर चेर्नोबिल जैसे नाम से डरना पड़ सकता है, जिसे कभी मानव भूल, तकनीकी चूक और राजनीतिक लापरवाही के प्रतीक के रूप में देखा गया था, और अब युद्ध के नए हथियार—ड्रोन—उस पर नई छाया डाल रहे हैं।





