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बीजेपी सरकार को नाम बदलने के अलावा भी कुछ आता है क्या?

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 24 फरवरी 2026

नाम बदलने की बहस और जनता का सीधा सवाल

देश में जब भी किसी राज्य या शहर का नाम बदलने की खबर आती है तो आम आदमी के मन में सबसे पहले यही सवाल उठता है कि इससे फायदा क्या होगा। केरल का नाम बदलकर “केरलम” करने के फैसले ने एक बार फिर यही बहस शुरू कर दी है। सरकार इसे सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय भाषा से जुड़ा कदम बता रही है, लेकिन लोगों का कहना है कि जब बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती बने हुए हैं तो नाम बदलने पर होने वाला भारी खर्च कितना सही है। इसलिए अब यह केवल पहचान का मुद्दा नहीं बल्कि खर्च और प्राथमिकताओं का सवाल भी बन गया है।

केरल से ‘केरलम’ करने का फैसला और उठते सवाल

केंद्र सरकार ने केरल विधानसभा के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए राज्य का नाम “केरलम” करने पर सहमति दी है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन लंबे समय से यह मांग कर रहे थे कि राज्य का नाम मलयालम भाषा के अनुसार किया जाए। समर्थकों का कहना है कि इससे सांस्कृतिक जुड़ाव मजबूत होगा, लेकिन विरोधियों का तर्क है कि इससे आम जनता की रोजमर्रा की समस्याओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

नाम बदलने की प्रक्रिया आसान नहीं होती

किसी भी राज्य का नाम बदलने के लिए विधानसभा का प्रस्ताव, केंद्र सरकार की मंजूरी और संसद में संशोधन जरूरी होता है। इसके बाद सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों में बदलाव की लंबी प्रक्रिया शुरू होती है। यही वजह है कि नाम परिवर्तन केवल घोषणा नहीं बल्कि प्रशासनिक रूप से बड़ा और समय लेने वाला कदम होता है।

नाम बदलते ही शुरू हो जाता है बड़ा खर्च

नाम बदलने के बाद सरकारी फाइलें, साइनबोर्ड, विभागीय रिकॉर्ड, स्कूल की किताबें, नक्शे, वेबसाइट और डिजिटल डाटाबेस तक में बदलाव करना पड़ता है। रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और सरकारी संस्थानों के नाम भी बदलने पड़ते हैं। इन सभी कामों में करोड़ों ही नहीं बल्कि कई बार हजारों करोड़ रुपये तक खर्च हो जाता है, क्योंकि यह बदलाव पूरे सिस्टम में लागू करना पड़ता है।

पहले भी बदले गए हैं कई राज्यों और शहरों के नाम

भारत में पहले भी कई राज्यों और शहरों के नाम बदले जा चुके हैं। मद्रास से तमिलनाडु, मैसूर से कर्नाटक और उड़ीसा से ओडिशा इसके उदाहरण हैं। शहरों में इलाहाबाद से प्रयागराज, गुड़गांव से गुरुग्राम, बैंगलोर से बेंगलुरु और मुगलसराय से पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर जैसे बदलाव हुए। हर बार सांस्कृतिक पहचान की बात कही गई, लेकिन खर्च और प्राथमिकताओं को लेकर बहस भी साथ-साथ चली।

खर्च आखिर जाता किसके पैसे से है

नाम बदलने का खर्च सीधे तौर पर सरकार उठाती है, लेकिन असल में यह पैसा जनता के टैक्स से ही आता है। राज्य सरकार अपने विभागों का खर्च उठाती है, जबकि रेलवे और केंद्रीय एजेंसियों से जुड़े बदलावों का खर्च केंद्र सरकार वहन करती है। इसलिए यह आर्थिक बोझ अंततः जनता पर ही पड़ता है।

क्या नाम बदलने से विकास होता है?

यही सबसे अहम सवाल है। विशेषज्ञों का मानना है कि नाम बदलने से विकास पर कोई सीधा असर नहीं पड़ता। रोजगार, निवेश, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं नीतियों और योजनाओं से बेहतर होती हैं, नाम बदलने से नहीं। आलोचकों का कहना है कि अगर यही पैसा स्कूल, अस्पताल और रोजगार के अवसर बढ़ाने में लगाया जाए तो उसका फायदा सीधे लोगों को मिलेगा।

पहचान की राजनीति बनाम विकास की जरूरत

समर्थकों का कहना है कि नाम बदलने से सांस्कृतिक गर्व और पहचान मजबूत होती है, जबकि विरोधियों का तर्क है कि सीमित संसाधनों वाले देश में प्राथमिकता विकास और जनहित को मिलनी चाहिए। यही वजह है कि नाम परिवर्तन का मुद्दा भावनाओं के साथ-साथ आर्थिक सोच और राजनीतिक प्राथमिकताओं से भी जुड़ जाता है।

निष्कर्ष: असली सवाल नाम नहीं, काम का है

केरल का नाम बदलने का फैसला एक बार फिर यह याद दिलाता है कि पहचान और विकास के बीच संतुलन जरूरी है। नाम बदलना भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन आम आदमी के लिए असली बदलाव वही है जो उसकी जिंदगी को बेहतर बनाए। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं में सुधार ही वास्तविक प्रगति की पहचान है। इसलिए जनता के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि नाम बदलने से ज्यादा जरूरी लोगों के जीवन में ठोस बदलाव लाना है।

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