राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 अगस्त 2026
रिजीजू राहुल के दरवाजे पर पहुंचे तो सवाल उठा—आखिर सरकार को चाहिए क्या?
नई दिल्ली: दिल्ली की राजनीति में कई बार पचास मिनट की बंद कमरे की बातचीत पचास भाषणों से ज्यादा कहानी कह जाती है। इस बार तस्वीर में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू हैं, सामने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी हैं और बैठक में प्रियंका गांधी भी मौजूद हैं। बाहर बताया गया कि कोशिश संसद में जारी गतिरोध खत्म करने की है, लेकिन अंदर की सियासी कहानी इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प बताई जा रही है। केंद्र में है—परिसीमन का बिल और उसे पास कराने के लिए जरूरी नंबरों का गणित। सरकार इसे आगे बढ़ाना चाहती है, विपक्ष इसके स्वरूप पर सवाल उठा रहा है और राहुल गांधी सरकार से छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई का जवाब मांग रहे हैं। ऐसे में रिजीजू का सीधे राहुल गांधी तक पहुंचना अपने आप में सवाल खड़ा करता है—अगर सब कुछ सामान्य संसदीय बातचीत ही है तो इतनी लंबी बैठक क्यों, और अगर सरकार के पास परिसीमन के लिए पर्याप्त समर्थन पहले से है तो कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को मनाने की इतनी जरूरत क्यों?
कहानी सदन चलाने की बताई गई, लेकिन असली पेंच परिसीमन का?
आधिकारिक तस्वीर यह है कि सरकार संसद में गतिरोध खत्म करना चाहती है और इसी सिलसिले में विपक्ष से बातचीत कर रही है। यह संसदीय लोकतंत्र में सामान्य प्रक्रिया भी है। लेकिन इस बार मामला साधारण विधेयक का नहीं है। परिसीमन से जुड़ा प्रस्ताव देश के राजनीतिक नक्शे, राज्यों के प्रतिनिधित्व और आने वाले दशकों की चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकता है। ऐसे बदलाव के लिए साधारण बहुमत से काम नहीं चलेगा। संविधान संशोधन की स्थिति में सरकार को विशेष बहुमत जुटाना होगा। यही वह जगह है जहां हर दल, हर सांसद और हर अनुपस्थिति तक का महत्व बढ़ जाता है। सरकार की तरफ से यह दावा जरूर सामने आया है कि आवश्यक संख्या उसके पास है और कांग्रेस से बातचीत व्यापक सहमति बनाने की कोशिश है, लेकिन विपक्ष इस दावे को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए सियासी सवाल सीधा है—अगर नंबर पूरे हैं तो इतनी बेचैनी क्यों, और अगर पूरे नहीं हैं तो सरकार उन्हें जुटाएगी कहां से?
50 मिनट की मुलाकात और प्रियंका की मौजूदगी—यहीं से बढ़ता है सस्पेंस
संसद में हंगामा होता है, सरकार विपक्ष से बात करती है और फ्लोर मैनेजर रास्ता निकालते हैं। इसमें कुछ असामान्य नहीं है। कांग्रेस की तरफ से केसी वेणुगोपाल जैसे वरिष्ठ नेता ऐसी संसदीय बातचीत संभालते रहे हैं। लेकिन इस बार बातचीत सीधे राहुल गांधी से हुई और करीब 50 मिनट चली। प्रियंका गांधी की मौजूदगी ने इसे और दिलचस्प बना दिया। जाहिर है, केवल सदन में अगले दिन का कामकाज तय करने के लिए इतनी उच्चस्तरीय राजनीतिक बातचीत जरूरी नहीं होती। इसीलिए राजनीतिक गलियारों में यह पढ़ा जा रहा है कि सरकार केवल संसद का शोर शांत नहीं कराना चाहती, बल्कि परिसीमन जैसे बड़े मुद्दे पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का मन भी टटोल रही है। राहुल गांधी क्या चाहते हैं, कांग्रेस कहां तक जा सकती है और किन शर्तों पर कोई बातचीत संभव है—रिजीजू की मुलाकात ने इन सवालों को अचानक केंद्र में ला दिया है।
सरकार के सामने असली दीवार—संविधान संशोधन के नंबर
परिसीमन की राजनीति भाषणों से ज्यादा अंकगणित की राजनीति है। संविधान संशोधन के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन के साथ सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत भी जरूरी होता है। यानी यहां एक-दो सांसद का पाला बदलना, कुछ सदस्यों का मतदान से दूर रहना या किसी क्षेत्रीय दल का अचानक रुख बदलना भी पूरा समीकरण प्रभावित कर सकता है। इसी कारण सरकार केवल अपने गठबंधन की संख्या देखकर निश्चिंत नहीं बैठ सकती। उसे उन दलों को भी देखना होगा जो किसी एक खेमे में पूरी तरह बंधे नहीं हैं। कुछ क्षेत्रीय दल परिसीमन के सिद्धांत के खिलाफ नहीं हो सकते, लेकिन अपने राज्य की सीटें और राजनीतिक वजन कम होने की आशंका से परेशान हैं। कुछ महिला आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन परिसीमन की शर्तों पर गारंटी चाहते हैं। यही वह बारीक गणित है जिसमें कांग्रेस का फैसला बहुत बड़ा हो जाता है।
एक तरफ छात्र, दूसरी तरफ परिसीमन—क्या चल रही है ‘एक हाथ लो, दूसरे हाथ दो’ की सियासत?
इस पूरी मुलाकात का दूसरा सिरा जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन और पुलिस कार्रवाई से जुड़ता है। राहुल गांधी छात्रों पर कथित लाठीचार्ज और पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर हैं। उनकी मांग है कि इस मुद्दे पर संसद में बाकायदा चर्चा हो और गृह मंत्री सदन के भीतर जवाब दें। दूसरी तरफ सरकार परिसीमन जैसे बड़े संवैधानिक मुद्दे पर विपक्ष को साथ लेना चाहती है। इसी से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या दोनों मुद्दों को लेकर कोई बीच का रास्ता तलाशा जा रहा है—सरकार छात्रों के सवाल पर चर्चा और जवाब के लिए तैयार हो और बदले में कांग्रेस परिसीमन पर अपना रुख कुछ नरम करे? ऐसे किसी औपचारिक सौदे की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीति में मुलाकात का समय भी संदेश देता है। फिलहाल दोनों पक्षों की जरूरतें एक ही मेज पर दिखाई दे रही हैं—राहुल को छात्रों पर जवाब चाहिए और सरकार को परिसीमन पर रास्ता।
लेकिन राहुल को मनाना इतना आसान भी नहीं—परिसीमन पर पहले ही खोल चुके हैं मोर्चा
सरकार के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यही है। राहुल गांधी परिसीमन के प्रस्तावित स्वरूप के खिलाफ पहले ही बेहद कड़ा राजनीतिक रुख अपना चुके हैं। कांग्रेस इसे केवल चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं बदलने की तकनीकी कवायद नहीं मान रही, बल्कि राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन से जुड़ा सवाल बता रही है। दक्षिण भारत के राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने की कीमत उन्हें लोकसभा में कम राजनीतिक वजन के रूप में न चुकानी पड़े। दूसरे राज्यों की अपनी चिंताएं हैं। ऐसी स्थिति में राहुल गांधी के लिए अचानक सरकार के बिल के समर्थन में खड़ा होना राजनीतिक रूप से आसान नहीं होगा। अगर उन्हें रुख बदलना है तो बदले में केवल संसद में एक चर्चा पर्याप्त नहीं होगी; कांग्रेस को राज्यों के हितों की सुरक्षा के लिए ठोस आश्वासन चाहिए होगा। यही वजह है कि राहुल ने सरकार से कहा है कि सभी दलों को भरोसे में लिया जाए और इस पर सर्वदलीय बैठक हो।
राहुल ने गेंद वापस सरकार के पाले में डाली—पहले सबको बताइए, आखिर करना क्या चाहते हैं
राहुल गांधी की सर्वदलीय बैठक की मांग को साधारण मांग समझना भूल होगी। इसका राजनीतिक अर्थ है—कांग्रेस अकेले बंद कमरे में कोई ऐसा फैसला नहीं करना चाहती जिसे बाद में बाकी विपक्षी दलों और राज्यों के सामने उसे समझाना पड़े। यदि सरकार परिसीमन को देश के लिए जरूरी मानती है तो वह सभी दलों के सामने पूरा खाका रखे। किस राज्य की कितनी सीटें बढ़ेंगी? क्या किसी राज्य का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होगा? जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के हित कैसे सुरक्षित किए जाएंगे? महिला आरक्षण और परिसीमन का रिश्ता किस तरह आगे बढ़ेगा? राहुल का दांव यहां दिलचस्प है—वह बातचीत से भाग भी नहीं रहे और सरकार को खाली चेक भी नहीं दे रहे। उन्होंने सरकार से कहा है कि बात करनी है तो पूरे विपक्ष और राज्यों के सामने कीजिए।
राहुल से मुलाकात के बाद सत्ता के भीतर संदेशों का दौर—मामला साधारण नहीं
राहुल गांधी से मुलाकात के बाद रिजीजू की सत्ता पक्ष के शीर्ष नेताओं से बातचीत की खबरों ने भी राजनीतिक उत्सुकता बढ़ाई है। संसदीय कार्य मंत्री का काम ही सरकार और विपक्ष के बीच पुल बनाना है, इसलिए इस तरह की बातचीत अपने आप में असामान्य नहीं है। लेकिन जब सामने परिसीमन जैसा बड़ा मुद्दा हो तो राहुल गांधी से मिले संकेतों का सरकार के शीर्ष स्तर तक पहुंचना स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। यही कारण है कि इस पूरी कवायद को महज ‘संसद चलाने की कोशिश’ कहकर खत्म नहीं किया जा सकता। दोनों पक्ष एक-दूसरे के पत्ते देख रहे हैं। सरकार जानना चाहती है कि कांग्रेस की अंतिम लाल रेखा क्या है और कांग्रेस यह समझना चाहती है कि सरकार आखिर कितनी दूर तक समझौता करने को तैयार है।
क्या बिल पास कराने से पहले सरकार सांसदों की ‘टेस्टिंग’ करेगी?
अब कहानी का एक और रोचक मोड़ है। मान लीजिए सरकार के पास फिलहाल पूरी तरह भरोसेमंद नंबर नहीं हैं, तब उसके सामने एक रास्ता यह हो सकता है कि प्रस्ताव को सदन में आगे बढ़ाकर वास्तविक राजनीतिक स्थिति देखी जाए। संसद में वोटिंग सिर्फ ‘हां’ और ‘ना’ नहीं बताती, वह कई छिपे हुए रिश्ते भी खोल देती है। कौन सरकार के साथ आया, किसने विरोध किया, कौन मतदान से गायब रहा, किस क्षेत्रीय दल के भीतर अलग-अलग राय दिखाई दी और किन सांसदों का रुख अपनी पार्टी से अलग रहा—एक वोटिंग पूरी राजनीतिक एक्स-रे रिपोर्ट सामने रख सकती है। हालांकि सरकार ने ऐसी किसी रणनीति की घोषणा नहीं की है और इसे निश्चित योजना नहीं कहा जा सकता, लेकिन विपक्षी हलकों में यह संभावना चर्चा में है कि परिसीमन पर सदन का मुकाबला अंतिम फैसला होने के साथ-साथ ‘हेड काउंट’ भी बन सकता है।
कौन साथ, कौन खिलाफ और कौन वोटिंग के दिन गायब—असली राजनीति यहीं होगी
यही कारण है कि केवल NDA और INDIA गठबंधन की घोषित संख्या जोड़कर परिसीमन का नतीजा निकाल लेना आसान नहीं है। संविधान संशोधन की राजनीति में कई बार वोट देने वाले से ज्यादा महत्वपूर्ण वह सांसद हो जाता है जो वोट देने ही नहीं आता। क्षेत्रीय दलों का अपना गणित है। वे दिल्ली की सरकार से रिश्ते भी खराब नहीं करना चाहते और अपने राज्य में यह संदेश भी नहीं देना चाहते कि उन्होंने राज्य का राजनीतिक वजन कम करने वाले किसी प्रस्ताव का आंख बंद करके समर्थन कर दिया। सरकार को ऐसे दलों के साथ अलग-अलग बातचीत करनी होगी और संभव है कि हर राज्य अपनी अलग शर्त रखे। यही वह जगह है जहां कांग्रेस का रुख बाकी विपक्ष के लिए भी दिशा तय कर सकता है।
तो क्या सचमुच चाबी राहुल गांधी के पास है?
पूरी सत्ता की चाबी किसी एक नेता के हाथ में बता देना राजनीतिक अतिशयोक्ति होगी। संसद आखिरकार नंबरों से चलती है और क्षेत्रीय दलों की अपनी ताकत और अपनी शर्तें हैं। लेकिन मौजूदा परिस्थिति में राहुल गांधी निश्चित रूप से उस जगह खड़े हैं जहां उनका फैसला सरकार की राह आसान या बेहद मुश्किल कर सकता है। कांग्रेस साथ आ जाए तो सरकार परिसीमन को व्यापक राष्ट्रीय सहमति के साथ आगे बढ़ाने का दावा कर सकती है। कांग्रेस पूरी ताकत से विरोध में उतर जाए तो सरकार को क्षेत्रीय दलों और विपक्षी सांसदों के बीच एक-एक वोट के लिए कहीं ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। और राहुल अगर कह दें कि “पहले हमारी शर्तें और राज्यों की चिंताएं सुनिए, उसके बाद बात होगी,” तो सरकार को बातचीत की मेज लंबी करनी पड़ेगी।
छात्रों का सवाल राहुल के हाथ में अलग राजनीतिक पत्ता
इस पूरे खेल में राहुल गांधी के पास छात्रों का मुद्दा भी एक बड़ा राजनीतिक दबाव है। जंतर-मंतर की पुलिस कार्रवाई को लेकर वह पीछे हटने को तैयार नहीं दिखाई दे रहे। पिछले दिनों छात्र आंदोलनों के मामले में उनकी रणनीति भी दिलचस्प रही है—छात्रों के आंदोलन को कांग्रेस का आंदोलन बनाने के बजाय उसके पीछे राजनीतिक ताकत के रूप में खड़े होने की कोशिश। अब अगर सरकार संसद में छात्रों पर हुई कार्रवाई पर चर्चा और गृह मंत्री के जवाब के लिए तैयार होती है तो राहुल इसे अपनी राजनीतिक जीत के रूप में पेश कर सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बदले में परिसीमन पर कांग्रेस स्वतः समर्थन दे देगी। दोनों मुद्दों को जोड़ने की चर्चा जरूर है, मगर अंतिम सौदा—अगर कोई होता भी है—उसकी शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं हैं।
सरकार का दावा—नंबर हमारे पास; फिर कांग्रेस के दरवाजे पर दस्तक क्यों?
यही इस कहानी का सबसे चुभता हुआ सवाल है। सरकार से जुड़े सूत्र कहते हैं कि संविधान संशोधन के लिए जरूरी समर्थन उसके पास है और कांग्रेस से बातचीत केवल व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने की कवायद है। यह संभव भी है—इतने बड़े संवैधानिक बदलाव पर सरकार विपक्ष के सबसे बड़े दल को पूरी तरह बाहर रखकर आगे बढ़ने से बचना चाहेगी। लेकिन राजनीति सवाल पूछती है। अगर नंबर पूरी तरह सुरक्षित हैं तो कांग्रेस को मनाने की जरूरत कितनी है? अगर कांग्रेस का समर्थन केवल औपचारिकता है तो सीधे राहुल गांधी तक पहुंचने की राजनीतिक अहमियत क्या है? और अगर राहुल का ‘ना’ सरकार के गणित पर कोई असर नहीं डालता तो उनकी शर्तों पर इतनी चर्चा क्यों हो रही है? इन सवालों के जवाब शायद संसद की अगली वोटिंग में ज्यादा साफ दिखाई देंगे।
परिसीमन की गाड़ी चौराहे पर—सरकार के पैर एक्सीलेरेटर पर, मगर सिग्नल अभी हरा नहीं
फिलहाल कहानी बेहद साफ भी है और बेहद उलझी हुई भी। सरकार परिसीमन को आगे बढ़ाना चाहती है। कांग्रेस उसके मौजूदा स्वरूप को लेकर सवाल उठा रही है। क्षेत्रीय दल अपने राज्यों के राजनीतिक वजन की सुरक्षा चाहते हैं। राहुल गांधी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर संसद में जवाब चाहते हैं। और इन सबके बीच किरेन रिजीजू करीब 50 मिनट तक राहुल गांधी से बातचीत करके निकलते हैं। इसलिए यह मुलाकात महज चाय, शिष्टाचार और सदन चलाने की सामान्य कवायद मान लेना मुश्किल है।
दिल्ली की राजनीति में अब असली सवाल यह नहीं है कि रिजीजू राहुल गांधी से मिलने क्यों गए। सवाल यह है कि राहुल ने उस कमरे में सरकार के सामने क्या रखा, सरकार उसमें से कितना मानने को तैयार है और अगर बात नहीं बनी तो परिसीमन के लिए बाकी नंबर कहां से आएंगे?
सरकार को रास्ता चाहिए। राहुल को जवाब चाहिए। क्षेत्रीय दलों को गारंटी चाहिए। और परिसीमन को चाहिए नंबर।
यानी फिलहाल परिसीमन की गाड़ी संसद के नंबरों के चौराहे पर फंसी है। सरकार एक्सीलेरेटर दबाने को तैयार है, लेकिन आगे का सिग्नल अभी हरा नहीं हुआ। और उस सिग्नल का रंग बदलने वालों में राहुल गांधी इस वक्त सबसे अहम चेहरों में जरूर हैं।




