महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 29 नवंबर 2025
दिल्ली-एनसीआर इस समय ज़हरीली गैस चेंबर में बदल चुका है। हवा इंसानों के लिए नहीं, बल्कि किसी रासायनिक प्रयोगशाला में भरे जहरीले धुएँ जैसी हो गई है। AQI कई जगह 450–500 पार कर चुका है—ऐसा स्तर जहाँ वैज्ञानिक साफ कहते हैं कि “यह हवा नहीं, धीमा ज़हर है।” बच्चे स्कूल जाते-आते दम घुटने की शिकायत कर रहे हैं, मास्क के पीछे भी खांसी रुक नहीं रही, डॉक्टर कह रहे हैं कि फेफड़े पहले से ही बीमारी की चपेट में आ चुके हैं। लेकिन जब राजधानी मर रही है, तब देश का शीर्ष नेतृत्व खामोश बैठा है—जैसे यह कोई राजनीतिक असुविधा हो, न कि राष्ट्रीय आपदा।
इसी मौन पर राहुल गांधी का हमला सीधा, तेज और चीर देने वाला है। उन्होंने कहा, “मोदी जी, बच्चे हमारे सामने घुट रहे हैं। भारतीय बच्चों का दम निकल रहा है। आपकी चुप्पी किस बात का संकेत है? क्या आपको यह त्रासदी दिखाई नहीं देती, या आपकी सत्ता की प्राथमिकताओं में बच्चों की सांसें शामिल नहीं हैं?”
राहुल गांधी ने साफ कहा कि यह मौसम की समस्या नहीं, यह केंद्रीय नेतृत्व की निष्क्रियता, नाकामी और संवेदनहीनता है, जो हर सर्दियों में दिल्ली को मरने के लिए छोड़ देती है। फैंसी भाषण विदेशों में दिए जाते हैं, लेकिन भारत की राजधानी की हवा मौत बनकर घूमती है—और प्रधानमंत्री की तरफ़ से एक शब्द भी नहीं।
राहुल गांधी ने अपनी बात को और भी कठोर बनाया: “मांएं मुझसे रोते हुए कह रही हैं कि उनका बच्चा सोते-सोते हांफने लगता है। लेकिन दिल्ली पर मंडरा रही यह ‘मेडिकल इमरजेंसी’ सरकार की फाइलों में कहीं दर्ज ही नहीं है। सरकार तब तक सक्रिय नहीं होती, जब तक टीवी चैनलों पर हंगामा न हो। यह कौन-सी संवेदनशीलता है? यह किस तरह की शासन-व्यवस्था है, जिसमें बच्चों के फेफड़े राजनीति का हिस्सा हैं, लेकिन समाधान नहीं?”
दिल्ली-एनसीआर का हवा संकट अब सिर्फ पर्यावरण की कहानी नहीं रहा। यह उस व्यवस्था का पोस्ट-मार्टम है जिसने 10 सालों में प्रदूषण पर एक भी निर्णायक, लागू योग्य, कठोर, वैज्ञानिक नीति नहीं बनाई। वाहनों का धुआँ बढ़ता गया, निर्माण-दूषित हवा फैलती गई, उद्योगों का उत्सर्जन आसमान में चढ़ता गया, पराली को लेकर केंद्र-राज्य झगड़ते रहे—और वही जनता हर साल इस जहर को फेफड़ों में भरती रही। सरकारों की मीटिंगें, विज्ञापन, बयान—सब दिखावे का ढेर बनकर रह गए।
राहुल गांधी ने बिल्कुल सटीक लिखा—यह सिर्फ हवा की समस्या नहीं, यह शासन के चरम असफल हो चुके मॉडल की पराकाष्ठा है, जहाँ संकट बढ़ता जाता है और सरकार गिरगिट की तरह रंग बदलती है—कभी कहती है मौसम कारण है, कभी राज्यों पर दोष डालती है, कभी डेटा ही बदल देती है। लेकिन दिल्ली का नागरिक जानता है कि यह ढहती हुई हवा राजनीतिक इच्छाशक्ति की सबसे बड़ी परीक्षा है—जिसमें सरकार हर बार फेल हो रही है।
सबसे डरावना पहलू यह है कि यह ज़हर सबसे ज्यादा उन गरीब बच्चों और परिवारों को मार रहा है जिनके पास न एयर प्यूरीफायर हैं, न महंगे अस्पतालों में इलाज कराने की क्षमता। राहुल गांधी ने इस पर बिल्कुल सही वार किया—“यह सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, यह सामाजिक न्याय का हत्याकांड है।”
इस सबके बीच सबसे बड़ा सवाल खड़ा है: जब राजधानी गैस चेंबर बन चुकी है, बच्चे आधी रात को सांस टूटने से जाग रहे हैं, स्कूल बंद करने की नौबत आ रही है, अस्पताल फुल हैं—तो देश का प्रधानमंत्री आखिर क्यों चुप है?
क्या यह सरकार सिर्फ चुनावी रैलियों, विज्ञापन अभियानों और PR में सक्रिय रहती है, और जन-स्वास्थ्य पर बयान देना उसे असहज लगता है? क्या दिल्ली के नागरिकों की जान सत्ता की प्राथमिकता में नहीं आती?
देश के विपक्षी नेताओं से लेकर वैज्ञानिकों और डॉक्टरों तक—हर कोई चेतावनी दे चुका है कि अगर यह प्रदूषण इसी तरह जारी रहा, तो अगले 10 सालों में भारत को ऐसा स्वास्थ्य संकट घेर सकता है जिसकी कीमत आने वाली तीन पीढ़ियाँ चुकाएँगी। मगर सत्ता का सिंहासन खामोशी से इस मौत के धुएँ को गुजरता देख रहा है—मानो यह किसी और देश की त्रासदी हो।
राहुल गांधी का प्रश्न आज दिल्ली-एनसीआर के हर माता-पिता का प्रश्न है—”क्या हम अपने बच्चों को इस जहरीली हवा के हवाले छोड़ दें? क्या देश का प्रधानमंत्री इस पर भी नहीं बोलेगा?” और यह सवाल अब सिर्फ राजनीतिक नहीं—नैतिक, संवैधानिक और मानवीय बन चुका है।





