एबीसी नेशनल न्यूज | 6 फरवरी 2026
इस देश में कभी प्रधानमंत्री की आलोचना करना सार्वजनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता था। आज वही आलोचना सवालों के घेरे में है। जाने-माने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के साथ हुई ताज़ा घटना ने इसी चिंता को नए सिरे से हवा दी है। आरोप है कि उन्हें मुंबई यूनिवर्सिटी के ‘जश्न-ए-उर्दू’ कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया, लेकिन आख़िरी क्षणों में उनका नाम कार्यक्रम से हटा दिया गया। यह सिर्फ़ एक आमंत्रण रद्द होने की खबर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मंचों पर असहमति के लिए घटती जगह की ओर इशारा करती है।
आख़िरी पल में रद्द हुआ निमंत्रण, आरोपों का पलटवार
नसीरुद्दीन शाह का कहना है कि उन्हें कार्यक्रम से हटाने के बाद यह भी प्रचारित किया गया कि उन्होंने स्वयं आने से मना किया था, जबकि ऐसा नहीं था। अभिनेता के मुताबिक, यह आरोप तथ्यहीन हैं और सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। इस दावे के साथ ही सवाल उठता है कि आयोजकों ने सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की और आख़िरी क्षण में निर्णय बदलने के पीछे क्या कारण रहे।
प्रधानमंत्री की आलोचना पर स्पष्ट रुख
अभिनेता ने अपने बयान में यह भी साफ़ किया कि वे लंबे समय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली के आलोचक रहे हैं। उनके शब्दों में, उन्हें प्रधानमंत्री का घमंड खटकता है और पिछले एक दशक में किए गए कामों से वे प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कभी ‘तथाकथित विश्वगुरु’ वाली छवि की प्रशंसा नहीं की। इस स्पष्टता के बाद यह सवाल और गहरा होता है कि क्या आलोचनात्मक विचार रखने वालों के लिए मंच सीमित किए जा रहे हैं।
विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक आयोजनों की भूमिका
विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को विचार-विमर्श और विविध मतों के लिए सुरक्षित स्थान माना जाता रहा है। ऐसे में मुंबई यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़े कार्यक्रम में आख़िरी पल का यह फैसला स्वाभाविक तौर पर बहस को जन्म देता है। आलोचकों का कहना है कि अगर सांस्कृतिक मंच भी असहमति से कतराने लगेंगे, तो समाज में संवाद की जगह और सिकुड़ जाएगी।
दोहरे मापदंडों का आरोप
इस पूरे प्रकरण के बीच एक और सवाल उठाया जा रहा है—क्या राजनीतिक रुख के आधार पर चयन और बहिष्कार हो रहा है? हाल ही में केंद्रीय मंत्री रवनीत बिट्टू के लिए मुखर समर्थन दिखाने वाले कई समूहों पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे ऐसे मामलों में चुप क्यों रहते हैं। आलोचकों का तर्क है कि अगर एक प्रतिष्ठित कलाकार के साथ ऐसा होता है, तो यह भेदभाव साफ़ दिखना चाहिए—चाहे कलाकार किसी भी समुदाय से हो।
धर्म बनाम आलोचना: असली वजह क्या?
सोशल मीडिया और बौद्धिक हलकों में यह बहस तेज़ है कि क्या समस्या किसी विशेष समुदाय से है या फिर सत्ता की आलोचना से। नसीरुद्दीन शाह के मामले को उदाहरण बनाकर कहा जा रहा है कि असहज सवाल उठाने वालों को धीरे-धीरे सार्वजनिक मंचों से दूर किया जा रहा है, जिससे असहमति को हतोत्साहित करने का माहौल बनता है।
आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतज़ार
अब तक न तो मुंबई यूनिवर्सिटी और न ही कार्यक्रम के आयोजकों की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने आया है। ऐसे में अभिनेता के आरोप और आयोजकों की चुप्पी—दोनों मिलकर संदेह को और गहरा कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि पारदर्शी जवाब ही इस विवाद को सुलझा सकते हैं।
अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खड़ा सवाल
यह मामला किसी एक अभिनेता या एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े सवाल को सामने लाता है कि क्या आज के भारत में प्रधानमंत्री की आलोचना करना सांस्कृतिक और शैक्षणिक मंचों से बाहर किए जाने का कारण बनता जा रहा है। नसीरुद्दीन शाह के साथ हुआ व्यवहार इसी चिंता का प्रतीक बनकर उभरा है—और इस पर खुली, ईमानदार बहस की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा महसूस की जा रही है।




