ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 24 मार्च 2026
सरकार अब चाहती है कि सोशल मीडिया पर कोई भी “गलत” या “आपत्तिजनक” कंटेंट एक घंटे के अंदर हटा दिया जाए। सुनने में यह फैसला सही लगता है—क्योंकि फेक न्यूज सच में बड़ा खतरा है। लेकिन असली सवाल यह है कि यह तय कौन करेगा कि क्या गलत है और क्या सही?
आज के समय में फेक न्यूज सिर्फ आम आदमी नहीं फैलाता। कई बार राजनीति से जुड़े लोग, बड़े-बड़े समर्थक ग्रुप और संगठनों से जुड़े लोग भी आधी-अधूरी या गलत जानकारी फैलाते देखे गए हैं। ऐसे में अगर सरकार सख्ती करना चाहती है, तो क्या वह अपने ही लोगों पर भी उतनी ही कार्रवाई करेगी? या फिर यह नियम सिर्फ कुछ खास आवाजों को दबाने के लिए इस्तेमाल होगा?
एक और बात समझने वाली है—एक घंटे में फैसला लेना आसान नहीं होता। कोई भी खबर सही है या गलत, यह समझने में समय लगता है। अगर जल्दबाजी में कंटेंट हटाया जाएगा, तो हो सकता है कि सच्ची बातें भी हटा दी जाएं। इससे पत्रकार, एक्टिविस्ट और आम आदमी—जो अपनी बात रखना चाहते हैं—उनकी आवाज दब सकती है।
सरकार का कहना है कि इससे देश में शांति बनी रहेगी और गलत जानकारी रुकेगी। लेकिन डर इस बात का है कि कहीं “शांति” के नाम पर “सवाल पूछने की आजादी” ही खत्म न हो जाए। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना ही सबसे बड़ी ताकत होता है।
इसलिए जरूरत सिर्फ सख्ती की नहीं, बल्कि ईमानदारी की भी है। अगर फेक न्यूज के खिलाफ लड़ाई लड़नी है, तो नियम सबके लिए बराबर होना चाहिए—चाहे वो सरकार में बैठा आदमी हो, किसी पार्टी का नेता हो या एक आम नागरिक। वरना यह लड़ाई फेक न्यूज के खिलाफ नहीं, बल्कि सच के खिलाफ बन जाएगी।




