ओपिनियन | महेंद्र सिंह | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 मई 2026
भारत में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांत भी राज्य को गौवंश संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रयास करने का निर्देश देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों ने गौ-रक्षा के नाम पर अनेक कठोर कानून बनाए, पशु वध पर प्रतिबंध लगाए और इसे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया। लेकिन आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इन कानूनों और अभियानों का वास्तविक लाभ गायों को मिला है, या फिर गौ-रक्षा का मुद्दा राजनीति और भावनाओं के बीच कहीं भटक गया है?
राजस्थान के जैसलमेर में सैकड़ों गायों के शव मिलने की हालिया घटना और इससे पहले छत्तीसगढ़ में भूख तथा कुपोषण से गायों की मौत के मामलों ने इस प्रश्न को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है। यदि देश में गौ-रक्षा को लेकर इतने सख्त कानून मौजूद हैं, तो फिर ऐसी घटनाएँ बार-बार क्यों सामने आ रही हैं? यह केवल प्रशासनिक विफलता का मामला नहीं है, बल्कि उस व्यापक विरोधाभास का प्रतीक है जिसमें गायों के नाम पर राजनीति तो खूब होती है, लेकिन उनके वास्तविक संरक्षण और कल्याण के लिए आवश्यक संसाधनों और व्यवस्थाओं का अभाव बना रहता है।
पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा हाल ही में जारी पशु वध नियंत्रण संबंधी अधिसूचना और उस पर कलकत्ता उच्च न्यायालय की मुहर ने भी इस बहस को नया आयाम दिया है। एक ओर सरकारें कानूनों को और अधिक कठोर बना रही हैं, वहीं दूसरी ओर यह सवाल बना हुआ है कि क्या केवल प्रतिबंधों से गायों की स्थिति बेहतर हो सकती है? वास्तविकता यह है कि कानून बनाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन लाखों गौवंश के लिए भोजन, चिकित्सा, आश्रय और आर्थिक प्रबंधन सुनिश्चित करना कहीं अधिक कठिन कार्य है।
गौ-रक्षा समर्थकों का तर्क है कि कठोर कानूनों से गौवंश की संख्या बढ़ेगी और अवैध वध पर रोक लगेगी। लेकिन उपलब्ध पशुधन आंकड़े बताते हैं कि कई राज्यों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं। इसके विपरीत आवारा पशुओं की समस्या तेजी से बढ़ी है। हजारों किसान रात-रात भर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं क्योंकि खुले घूम रहे पशु उनकी फसलें नष्ट कर देते हैं। जब कोई गाय दूध देना बंद कर देती है या बूढ़ी हो जाती है, तब उसके पालन-पोषण का खर्च किसान के लिए भारी आर्थिक बोझ बन जाता है। ऐसी स्थिति में अनेक पशु सड़कों, खेतों और शहरों में भटकते दिखाई देते हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि गौ-रक्षा के नाम पर सबसे अधिक दबाव उसी किसान पर पड़ता है जिसने वर्षों तक उस पशु की सेवा की होती है। गौशालाओं की स्थिति भी बहुत उत्साहजनक नहीं है। अधिकांश गौशालाएं वित्तीय संकट, चारे की बढ़ती कीमतों और पशु चिकित्सकीय सुविधाओं की कमी से जूझ रही हैं। परिणामस्वरूप कई स्थानों पर गायों को पर्याप्त भोजन और देखभाल तक उपलब्ध नहीं हो पाती। ऐसे में गौ-रक्षा का दावा नैतिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर सवालों के घेरे में आ जाता है।
यह भी सच है कि भारत में गाय के प्रति सम्मान और श्रद्धा सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है। लेकिन किसी भी आस्था की वास्तविक परीक्षा उसके संरक्षण और संवर्धन में दिखाई देती है, केवल नारों और राजनीतिक भाषणों में नहीं। यदि गायों की दुर्दशा की खबरें लगातार सामने आती रहें और किसान तथा गौशालाएं संकट में रहें, तो यह मानना कठिन होगा कि वर्तमान व्यवस्था अपने घोषित उद्देश्यों को पूरा कर रही है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि गौ-रक्षा को केवल धार्मिक या राजनीतिक मुद्दा मानने के बजाय पशु कल्याण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से देखा जाए। आधुनिक गौशालाओं का निर्माण, पशु स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, किसानों को आर्थिक सहायता, जैविक कृषि और गो-आधारित उद्योगों को बढ़ावा तथा अनुपयोगी पशुओं के संरक्षण के लिए स्थायी वित्तीय मॉडल विकसित किए जाने चाहिए। केवल दंडात्मक कानूनों के सहारे गौ-संरक्षण का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता।
भारत को ऐसी संतुलित नीति की आवश्यकता है जिसमें आस्था का सम्मान भी हो और व्यवहारिक समाधान भी। गौ-रक्षा की सफलता कानूनों की कठोरता से नहीं, बल्कि गायों की वास्तविक स्थिति से मापी जानी चाहिए। जिस दिन देश की हर गाय को भोजन, आश्रय, चिकित्सा और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध होगा, उसी दिन गौ-रक्षा का उद्देश्य वास्तव में पूरा माना जाएगा। उससे पहले यह बहस जारी रहेगी कि क्या हम गाय की रक्षा कर रहे हैं, या केवल उसके नाम पर राजनीति कर रहे हैं।




