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भारत में भ्रष्टाचार कोई गुनाह नहीं—ये हमारी आदत में शुमार है

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लेखक: आलोक वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार | नई दिल्ली 5 दिसंबर 2025

भारत में भ्रष्टाचार को अक्सर लालच या बेईमानी की वजह से माना जाता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं गहरी है। दुनिया में हर जगह लालच और बेईमान लोग होते हैं, पर हर देश भारत जितना भ्रष्ट नहीं होता। यहाँ भ्रष्टाचार अचानक नहीं पैदा हुआ—यह धीरे-धीरे हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी, हमारे सोचने के तरीके और काम करने के तरीके में शामिल हो गया है। 2020 की ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल रिपोर्ट में भारत एशिया का सबसे भ्रष्ट देश बताया गया, जहाँ आधे से ज़्यादा लोगों ने माना कि उन्होंने सरकारी काम करवाने के लिए रिश्वत दी। यह दिखाता है कि समस्या सिर्फ लोगों में नहीं, बल्कि पूरे समाज और व्यवस्था (सिस्टम) में है।

भारत में भ्रष्टाचार का एक बड़ा कारण यह है कि लोग इसे गलत नहीं, बल्कि जरूरत मानते हैं। जब फाइलें महीनों रुकी रहती हैं, अस्पताल में बेड के लिए सिफारिश चाहिए होती है, पुलिस रिपोर्ट के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं, और कोर्ट में केस सालों नहीं, पीढ़ियों तक चलता है—तो लोग शॉर्टकट अपनाते हैं। रिश्वत देना उन्हें बुद्धिमानी लगती है, बेईमानी नहीं। उन्हें लगता है कि अगर सिस्टम भरोसे लायक नहीं है, तो हमें खुद ही रास्ता बनाना होगा। इस तरह भ्रष्टाचार लोगों का बचाव का तरीका बन जाता है।

समाज में भी भ्रष्टाचार को बुरा नहीं माना जाता। कोई ₹200 देकर लाइन से बच जाता है, कोई चालान से छुटकारा पा लेता है, कोई कॉलेज में पैसे देकर सीट ले लेता है—और समाज उसे चालाक, समझदार या ‘जुगाड़ू’ कहकर सराहता है। हमारे यहाँ ‘जुगाड़’, ‘सेटिंग’, ‘सिफारिश’, ‘स्रोत’ जैसे शब्द गलत नहीं माने जाते, बल्कि काम निकालने की कला माने जाते हैं। जब समाज किसी गलत काम को गलत ही नहीं मानता, तो वह धीरे-धीरे संस्कृति बन जाता है।

आर्थिक कमजोरी भी भ्रष्टाचार का बड़ा कारण है। कई सरकारी कर्मचारी बहुत कम वेतन में बहुत बड़ी जिम्मेदारी उठाते हैं। डॉक्टरों पर मरीजों का भारी बोझ होता है, पुलिस वाले दिन-रात काम करते हैं, कई सरकारी नौकरियों में पोस्टिंग के लिए पहले से ही ‘खर्चा’ तय होता है। नेता करोड़ों रुपये खर्च करके चुनाव लड़ते हैं लेकिन धन का साफ-साफ हिसाब नहीं होता। ऐसे में कई लोग भ्रष्टाचार को अपनी कमाई या “मुआवज़ा” समझने लगते हैं। सिस्टम उनसे बड़ा काम उम्मीद करता है, लेकिन पूरी व्यवस्था उन्हें सपोर्ट नहीं देती—इस खाली जगह को भरने के लिए लोग भ्रष्टाचार का सहारा लेते हैं।

हमारे इतिहास ने भी भ्रष्टाचार को बढ़ाया है। सैकड़ों साल तक भारत में शासन जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि टैक्स वसूली के लिए था। पहले मुगल शासन, फिर अंग्रेजों ने ऐसा सिस्टम बनाया जहाँ सरकार जनता से दूर रहती थी। आज़ादी के बाद नेता बदल गए, लेकिन व्यवस्था वही रही। भारत के लोग सरकार पर भरोसा करना नहीं सीख पाए—उन्होंने यह सीखा कि काम तभी होगा जब आप अपने तरीके से कराएँ। इसलिए भ्रष्टाचार विश्वासघात नहीं, बल्कि अविश्वास की पुरानी आदत का नतीजा है।

भारत में भ्रष्टाचार जाति, धर्म, भाषा, अमीरी-गरीबी किसी भी चीज़ की सीमा नहीं देखता। हर वर्ग और हर समुदाय इसमें फँसा हुआ है—क्योंकि समस्या व्यक्ति की नहीं, सिस्टम की है। दक्षिण भारत का व्यापारी हो या उत्तर भारत का किसान, मुस्लिम रिक्शावाला हो या हिंदू कारोबारी—हर किसी को काम करवाने के लिए एक ही व्यवस्था से लड़ना पड़ता है, और अक्सर उपाय भी एक ही निकाला जाता है: रिश्वत या जुगाड़।

वर्षों में कई घोटालों ने दिखाया है कि भ्रष्टाचार कितना गहरा है। व्यापम कांड में पैसे लेकर छात्रों को पास किया गया और अयोग्य लोग डॉक्टर और अधिकारी बन गए। निरव मोदी–PNB मामले ने दिखाया कि बड़े-बड़े बैंक भी अंदर से कैसे खोखले हो सकते हैं। अस्पतालों में रेफ़रल कमीशन ने इलाज को इंसानी सेवा नहीं, बल्कि बिज़नेस बना दिया। यहाँ तक कि धार्मिक संस्थानों तक में गड़बड़ियाँ पाई गईं—यह साबित करता है कि भ्रष्टाचार न तो किसी धर्म का है, न किसी एक वर्ग का।

सबसे डरावनी बात यह है कि अब भ्रष्टाचार छिपाया नहीं जाता—पहले से जान लिया जाता है कि “कुछ देना पड़ेगा।” रिश्वत अब गलत काम नहीं लगती, बल्कि एक जरूरी प्रक्रिया बन गई है। यह सामान्यीकरण भ्रष्टाचार को और ताकतवर बनाता है।

डिजिटल इंडिया ने कई जगह भ्रष्टाचार कम किया—DBT ने फर्जी लाभार्थी हटाए, UPI ने नकद लेनदेन घटाया, ई-टेंडरिंग ने सरकारी खरीद को पारदर्शी बनाया। लेकिन भ्रष्टाचार तकनीक के साथ बदल भी गया—अब यह फोन कॉल की जगह डिजिटल ट्रांज़ैक्शन, फर्जी बिल और शेल कंपनियों में बदल गया है।

अब असली सवाल यही है कि भ्रष्टाचार आखिर है क्या—नैतिक समस्या, आर्थिक मजबूरी, सामाजिक आदत या ऐतिहासिक विरासत? सच यह है कि भ्रष्टाचार इन चारों का मिलाजुला रूप है, इसलिए इसे खत्म करना मुश्किल लगता है, लेकिन असंभव नहीं। कानून बनाना जरूरी है, पर केवल कानून से बदलाव नहीं आएगा; तेज़ और भरोसेमंद न्याय, पारदर्शी व्यवस्था, ईमानदार लोगों की सुरक्षा और चुनावी फंडिंग की साफ व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। असली बदलाव समाज की सोच से आएगा—जब लोग रिश्वत लेकर गर्व नहीं, शर्म महसूस करेंगे; जब ईमानदार लोगों को कमजोर नहीं, बल्कि ताकतवर माना जाएगा; और जब समाज भ्रष्ट लोगों का सम्मान करना बंद कर देगा। याद रखिए, भ्रष्टाचार तब नहीं रुकता जब लोग पैसे लेना बंद कर दें—भ्रष्टाचार तब रुकता है जब समाज ऐसे लोगों की इज्जत करना छोड़ देता है।

सच्चा बदलाव कानून से नहीं, हमारी सोच से आएगा—घर से, स्कूल से, दफ्तर से और हमारी रोज़मर्रा की बातचीत से। जिस दिन भारत भ्रष्टाचार को ‘चतुराई’ मानना छोड़ देगा, उसी दिन उसकी जड़ें कमजोर होने लगेंगी।

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