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संविधान बनाम महाभियोग: जज वर्मा केस में संसद और सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने

नई दिल्ली/इलाहाबाद- 28 जुलाई 2025 , सुप्रीम कोर्ट में आज इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा की याचिका पर सुनवाई शुरू हुई जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ इन-हाउस जांच समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी है। यह मामला उस विवाद से जुड़ा है, जिसमें मार्च 2025 में उनके दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास से आग के बाद अधजली मुद्रा मिलने का आरोप सामने आया था। न्यायमूर्ति वर्मा ने रिपोर्ट को “असंवैधानिक” और “संसद की अधिकारिता का अतिक्रमण” करार दिया है।

इससे पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को उनके हटाए जाने की सिफारिश की थी, जिस पर लोकसभा में 152 सांसदों ने हस्ताक्षर कर महाभियोग प्रस्ताव लाया। हालांकि राज्यसभा में विपक्ष द्वारा पेश समान प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया गया।

आज सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ— न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और ए.जी. माशी—ने मामले की सुनवाई करते हुए कई गंभीर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की प्रमुख बातें:

जस्टिस दत्ता ने पूछा: “क्या न्यायमूर्ति वर्मा जांच समिति के समक्ष उपस्थित हुए थे? अगर हां, तो सीधे सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं आए?”

कपिल सिब्बल, वकील के रूप में पेश होते हुए बोले: “यह पूरी प्रक्रिया संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। जब तक जज इनक्वायरी एक्ट के तहत दोष सिद्ध नहीं होता, तब तक जज के आचरण पर सार्वजनिक चर्चा असंवैधानिक है।”

सिब्बल ने अनुच्छेद 124(4) और अनुच्छेद 217(1)(b) का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की तरह ही हाई कोर्ट के जजों को हटाने की प्रक्रिया संसद के जरिये होती है और उसमें सर्वोच्च सतर्कता अपेक्षित है।

न्यायमूर्ति दत्ता ने याचिका की गंभीरता पर सवाल उठाते हुए कहा: “यह याचिका इतनी सामान्यतया नहीं दायर की जानी चाहिए थी। रिपोर्ट को सार्वजनिक डोमेन में कह देने भर से कोर्ट के रिकॉर्ड पर नहीं माना जा सकता।”

संसद में गर्मागर्म माहौल:

वहीं दूसरी ओर, संसद में भी इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि यह प्रस्ताव सरकार द्वारा नहीं, बल्कि सांसदों द्वारा लाया गया है, जिससे सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने राज्यसभा में इस मुद्दे को पहले ही उठाया था।

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने दावा किया कि 150 से अधिक सांसदों ने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें सत्ता और विपक्ष दोनों के प्रतिनिधि शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा में विपक्ष का प्रस्ताव मिलने के बाद अचानक इस्तीफा दे दिया था, जिससे संसदीय गलियारों में हलचल तेज हो गई।

विवाद का सार:

  1. 14-15 मार्च की रात दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगी थी।
  2. आग बुझाने के दौरान प्रवर्तन एजेंसियों को अधजली नकदी मिली।
  3. वर्मा उस रात भोपाल यात्रा पर थे, उनके अनुसार नकदी उनकी नहीं थी।
  4. SC कोलेजियम ने उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर किया, जिसे पहले “अफवाहों से असंबंधित” बताया गया।

यह मामला अब न्यायपालिका की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और संसद के अधिकारों के बीच संतुलन की कसौटी बनता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और संसद में महाभियोग की कार्यवाही दोनों मिलकर भारतीय लोकतंत्र में न्यायिक जवाबदेही के भविष्य की दिशा तय कर सकती हैं। अगली सुनवाई और संसद में चर्चा पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।

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