आलोक कुमार | नई दिल्ली 22 नवंबर 2025
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने शुक्रवार को भावुक विदाई लेते हुए न्यायपालिका में अपने अध्याय का समापन किया। अंतिम दिन कोर्ट नंबर 1 में आयोजित औपचारिक समारोह में उन्होंने कहा कि वे इस सर्वोच्च संस्था से “न्याय के विद्यार्थी” के रूप में विदा ले रहे हैं और उन्हें “पूर्ण संतोष” है कि उन्होंने अपनी क्षमता अनुसार देश और न्याय व्यवस्था के लिए सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पद उनके लिए सत्ता या अधिकार का प्रतीक नहीं था, बल्कि समाज की सेवा का अवसर था, जिसे उन्होंने पूरी निष्ठा से निभाया। उनके इस बयान ने अदालत में मौजूद न्यायाधीशों, वरिष्ठ वकीलों और बार प्रतिनिधियों को भावुक कर दिया।
गवई ने अपने 22 साल के न्यायिक करियर को याद करते हुए कहा कि वे पेशे में प्रवेश के समय “कानून के विद्यार्थी” थे और आज भी स्वयं को सीखने की अवस्था में पाते हैं। उन्होंने कहा कि न्याय की प्रक्रिया में निरंतर सीखना, संवेदनशील होना और समाज की नब्ज़ को समझना सबसे आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि अपने कार्यकाल में उन्होंने 400 से अधिक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाए, जिनका उद्देश्य न्याय को केवल दस्तावेजों और अदालतों तक सीमित न रखकर आम नागरिक की समझ और पहुँच तक विस्तार देना था। वे मानते हैं कि न्यायाधीश का सबसे बड़ा दायित्व है कि वह अपना निर्णय इस तरह लिखे जिसे पढ़कर आम आदमी समझ सके कि न्याय कैसे हुआ।
विदाई समारोह में उपस्थित सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने उनके सरल स्वभाव, सहज पहुँच और जूनियर अधिवक्ताओं के प्रति सम्मान की भावना की सराहना की। कई अधिवक्ताओं ने कहा कि गवई के कार्यकाल में अदालत का वातावरण अधिक मानवीय और सहयोगपूर्ण रहा, और महिला वकीलों विशेष रूप से सुरक्षित और सम्मानित महसूस करती थीं। सुप्रीम कोर्ट बार ने उन्हें “सुलभ और संवेदनशील न्यायाधीश” की उपाधि देते हुए कहा कि वे अदालत को केवल कानूनी विवादों का मंच नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का उपकरण मानते थे।
गवई का कार्यकाल इसलिए भी ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि वे देश के पहले बौद्ध और मात्र दूसरे दलित न्यायाधीश थे जिन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायिक पद को संभाला। उनके इस पद तक पहुँचने को भारतीय न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व और समान अवसर के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने स्वयं कहा कि वे इस जिम्मेदारी का भार महसूस करते थे और हमेशा प्रयास करते रहे कि न्यायपालिका उन वर्गों की आवाज़ बने जो अक्सर हाशिये पर रह जाते हैं।
गवई की जगह अब जस्टिस सूर्याकांत नए चीफ जस्टिस के रूप में पदभार ग्रहण करेंगे। हालांकि विदाई समारोह ने यह स्पष्ट कर दिया कि गवई की न्याय दृष्टि, संवेदनशीलता और सेवा भाव आने वाले समय में भी सुप्रीम कोर्ट की कार्यशैली और न्यायिक सोच पर प्रभाव डालते रहेंगे। उनके शब्द—“मैं संतोष के साथ जा रहा हूँ कि मैंने देश के लिए जो कर सकता था, किया”—ने इस विदाई को केवल पद परिवर्तन नहीं, बल्कि एक विचारधारा के हस्तांतरण का क्षण बना दिया।
समग्र रूप से, CJI गवई की विदाई ने यह संदेश दिया कि न्याय केवल कानून की व्याख्या नहीं, बल्कि समाज की उम्मीदों, मानवता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का नाम है। उनका कार्यकाल इस बात की मिसाल रहा कि न्यायपालिका में परिवर्तन केवल आदेशों से नहीं, बल्कि दृष्टिकोण और संवेदना से आता है। उनकी यात्रा ने यह साबित किया कि सबसे ऊँचे पद पर बैठे व्यक्ति भी आजीवन विद्यार्थी रह सकते हैं—न्याय के, समाज के और मानवता के।





