एबीसी नेशनल न्यूज | वाशिंगटन/ नई दिल्ली | 21 फरवरी 2026
बच्चों और किशोरों में सोशल मीडिया की बढ़ती लत अब केवल पारिवारिक चिंता का विषय नहीं रही, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य और नीतिगत मुद्दा बन चुकी है। यही कारण है कि दुनिया के कई देशों में अदालतों, सरकारों और नियामक संस्थाओं को इस पर हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। हालिया सुनवाई में मेटा प्रमुख Mark Zuckerberg से हुई सख्त पूछताछ इस व्यापक चिंता का ही प्रतिबिंब है।
आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी?
सबसे बड़ा कारण सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का डिजाइन है, जो उपयोगकर्ताओं को लंबे समय तक जोड़े रखने के लिए तैयार किया जाता है। एल्गोरिद्म आधारित कंटेंट, लगातार नोटिफिकेशन, रील्स और गेमिफिकेशन जैसी सुविधाएं बच्चों के लिए अत्यधिक आकर्षक होती हैं। विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों और कई शोध संस्थानों ने पाया है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में चिंता, अवसाद, नींद की कमी और आत्मविश्वास से जुड़ी समस्याओं को बढ़ा सकता है।
दूसरी बड़ी समस्या आयु सत्यापन की कमजोरी है। प्लेटफॉर्म पर आयु सीमा मौजूद होने के बावजूद बच्चे गलत जानकारी देकर आसानी से अकाउंट बना लेते हैं। तकनीकी सीमाएं और पहचान सत्यापन के जटिल तरीके इस नियम को प्रभावी बनने से रोकते हैं।
तीसरा कारण सामाजिक दबाव और डिजिटल संस्कृति है। बच्चों के लिए ऑनलाइन मौजूदगी अब सामाजिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। दोस्तों के बीच सक्रिय रहने, लाइक्स और फॉलोअर्स पाने की चाह उन्हें लगातार ऑनलाइन बनाए रखती है।
अदालतों और सरकारों को हस्तक्षेप क्यों करना पड़ा?
जब मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, अभिभावकों और स्कूलों से लगातार शिकायतें आने लगीं, तो यह मुद्दा निजी जिम्मेदारी से निकलकर सार्वजनिक नीति का विषय बन गया। कई देशों में सरकारें आयु सत्यापन कानून, स्क्रीन टाइम नियंत्रण और एल्गोरिद्म पारदर्शिता जैसे कदमों पर विचार कर रही हैं। अदालतों में चल रही सुनवाई तकनीकी कंपनियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
समाधान क्या हो सकता है?
समाधान केवल एक पक्ष के पास नहीं है, बल्कि यह साझा जिम्मेदारी है।
तकनीकी कंपनियां: मजबूत आयु सत्यापन, बच्चों के लिए सीमित फीचर्स और एल्गोरिद्म पारदर्शिता लागू करें।
सरकार: स्पष्ट नियम, डेटा सुरक्षा कानून और बच्चों के डिजिटल अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।
अभिभावक: स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण, संवाद और डिजिटल शिक्षा को प्राथमिकता दें।
स्कूल: डिजिटल साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाएं।
बच्चों की सोशल मीडिया लत केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और नीतिगत चुनौती है। अदालतों में उठते सवाल इस बात का संकेत हैं कि अब कंपनियों, सरकारों और समाज को मिलकर संतुलित डिजिटल वातावरण बनाना होगा। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या आने वाली पीढ़ियों के मानसिक और सामाजिक विकास पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।




