नई दिल्ली, 25 सितंबर 2025
दिल्ली हाई कोर्ट में आज एक अहम सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 10 दिनों के भीतर उपयुक्त सरकारी आवास उपलब्ध करा दिया जाएगा। यह आश्वासन सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर से अदालत में दर्ज कराया गया। मामला उस याचिका से जुड़ा था जिसमें आप ने मांग की थी कि राष्ट्रीय पार्टी के प्रमुख के तौर पर केजरीवाल को सरकारी आवास आवंटित किया जाए।
AAP की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि केंद्र सरकार की 31 जुलाई 2014 की नीति के अनुसार, कोई भी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष, यदि उसके पास पहले से कोई सरकारी आवास न हो, तो दिल्ली में एक आधिकारिक आवास पाने का हकदार है। पार्टी का तर्क था कि अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद अपने आधिकारिक आवास को खाली कर दिया था और इस समय उनके पास कोई अन्य सरकारी आवास नहीं है। इसलिए उन्हें तुरंत उचित श्रेणी का आवास दिया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कोर्ट को बताया कि “10 दिनों के भीतर, जो भी श्रेणी के आवास केजरीवाल के लिए निर्धारित हैं, उनमें से एक उचित आवास उन्हें आवंटित कर दिया जाएगा।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में किसी तरह की देरी नहीं होगी और यह कार्य पूरी पारदर्शिता से किया जाएगा। इस पर AAP की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राहुल मेहरा ने कहा कि यदि पहले केजरीवाल को टाइप VII या टाइप VIII श्रेणी का बंगला दिया गया था, तो अब उन्हें किसी भी सूरत में उससे निचली श्रेणी का आवास नहीं दिया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने केंद्र के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया और कहा कि सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी आवास आवंटन की प्रक्रिया किसी के विवेक या मनमानी पर आधारित न हो। अदालत ने टिप्पणी की कि सरकारी आवास की नीति को और अधिक स्पष्ट एवं पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है ताकि इस तरह के विवाद भविष्य में न उठें। उन्होंने यह भी कहा कि यह समस्या केवल नेताओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई बार अधिकारियों और अन्य पदाधिकारियों के मामले में भी देखने को मिलती है।
अब अदालत इस मामले में केंद्र के बयान को ध्यान में रखते हुए आदेश पारित करेगी। यदि वाकई 10 दिनों के भीतर आवास आवंटन हो जाता है तो यह AAP और अरविंद केजरीवाल के लिए एक बड़ी राहत होगी। दूसरी ओर, यदि किसी कारणवश आवंटित आवास पर आपत्ति होती है, तो इसके लिए पार्टी को पुनर्विचार का अवसर मिल सकता है। फिलहाल, इस मामले ने एक बार फिर सरकारी आवास आवंटन की नीति और उसकी पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं और यह देखना होगा कि आने वाले दिनों में केंद्र इस दिशा में क्या सुधार करता है।




