“डिजिटल इंटीमेसी: क्या ऑनलाइन रिश्ते असली होते हैं?”
स्क्रीन से शुरू होता रिश्ता: 21वीं सदी के डिजिटल युग में, दोस्ती और प्यार अब बगल वाली सीट से नहीं, स्क्रीन के इस पार से
स्क्रीन से शुरू होता रिश्ता: 21वीं सदी के डिजिटल युग में, दोस्ती और प्यार अब बगल वाली सीट से नहीं, स्क्रीन के इस पार से
(जब भरोसा टूटता है मन से या तन से) आधुनिक रिश्तों की नाजुक डोर 21वीं सदी के संबंध बहुत तेज़ी से विकसित हो रहे हैं।
एक नए युग के रिश्तों की सच्चाई: आज के आधुनिक शहरी समाज में रिश्तों की परिभाषाएं तेजी से बदल रही हैं। अब सिर्फ “रिश्ता” होना
यौन स्वतंत्रता या सामाजिक संक्रमण? भारत के प्रमुख महानगरों—दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और हैदराबाद—में बीते एक दशक में सामाजिक संबंधों की परिभाषा तीव्रता से बदली
जब भी यौन संबंध की बात होती है, समाज में या तो चुप्पी छा जाती है या फुसफुसाहट। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि
परिधान बदलते हैं, पर परंपरा नहीं आज का युवा एक ऐसे दौर में जी रहा है जहाँ फैशन उसके व्यक्तित्व का पहला चेहरा बन चुका
भारत की सभ्यता ने वेद, उपनिषद, महाकाव्य और लोक साहित्य के ज़रिए ज्ञान को पीढ़ियों तक पहुँचाया। पर आज का युवा पढ़ने से कतराने लगा
आज का युवा हर समय किसी न किसी से जुड़ने की कोशिश में लगा हुआ है — वह रिश्तों में संतुलन बनाना चाहता है, करियर
मास्टरबेशन (हस्तमैथुन) शब्द सुनते ही कई लोग असहज हो जाते हैं। समाज में इसे अक्सर शर्म, अपराधबोध या “असंसकारी” व्यवहार के रूप में देखा जाता
सेक्स को समझने का समय है सेक्स… एक ऐसा शब्द जिसे अक्सर या तो शर्म से ढक दिया जाता है या फिर सिर्फ शरीर की