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राष्ट्रीय सुरक्षा — भारत की अस्मिता, अखंडता और अस्तित्व की अंतिम रेखा

भूमिका: राष्ट्रीय सुरक्षा कोई विभाग नहीं, यह राष्ट्र की आत्मा है भारत एक उदार, बहुलतावादी, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है — लेकिन यह सब तब तक सुरक्षित है, जब तक इसकी राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत और सतर्क है। राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमा पर सेना की तैनाती या युद्ध की तैयारियों तक सीमित नहीं है; यह एक

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रेप स्टेट बनता पश्चिम बंगाल: अपराध, असुरक्षा और एक महिला मुख्यमंत्री की चुप्पी

भय और रक्त से लथपथ बंगाल: क्या यह भारत का नया रेप कैपिटल बन चुका है? पश्चिम बंगाल, जिसे कभी सांस्कृतिक चेतना और बौद्धिकता की राजधानी कहा जाता था, आज भय, अपराध और महिलाओं के खिलाफ जघन्य यौन हिंसा की घटनाओं से बदनाम होता जा रहा है। ममता सरकार खुद को ‘जननी सुरक्षा’ और ‘कन्याश्री’

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नवभारत का निर्माण: विविधता, एकता और शांति का अनमोल संदेश

भारत, जिसे “सर्वधर्म समभाव” का जीवंत उदाहरण माना जाता है, अपने सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता में एकता का अद्भुत नमूना प्रस्तुत करता है। यह एक ऐसा देश है जहाँ एक ओर मंदिरों की घंटियाँ सुनाई देती हैं, वहीं दूसरी ओर मस्जिदों से अजान की आवाज गूँजती है; चर्चों की शांति प्रार्थनाएँ होती हैं तो गुरुद्वारों

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नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) की नैतिकता, अंतरराष्ट्रीय मान्यता और भारतीय लोकतंत्र में इसका ऐतिहासिक महत्व

भारत ने 2019 में जो नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित किया, वह न केवल एक कानूनी पहल थी, बल्कि मानवता, नैतिकता और ऐतिहासिक उत्तरदायित्व का एक दस्तावेज़ भी था। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे इस्लामिक राष्ट्रों में धार्मिक अल्पसंख्यकों — विशेषकर हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी समुदायों — पर दशकों से जो उत्पीड़न

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युद्ध: कारण, प्रभाव और विश्व शांति की दिशा में भारत का मार्ग

आज का विश्व एक अजीब दौर से गुजर रहा है, जहां एक तरफ विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने इंसानी जीवन को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है, वहीं दूसरी ओर युद्ध और संघर्ष ने इस प्रगति को ध्वस्त करने का बीड़ा उठा रखा है। जब हम युद्ध के कारणों और प्रभावों पर विचार करते हैं, तो

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भारत में डेमोग्राफिक जिहाद और लैंड जिहाद – सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए एक अदृश्य युद्ध

भारत एक सहिष्णुता और विविधता का देश रहा है, जहाँ सदियों से विभिन्न धर्म, जातियाँ, भाषाएँ और समुदाय एक साथ रहते आए हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार से कुछ विशेष क्षेत्रों में जनसंख्या संतुलन को धर्म के आधार पर रणनीति के तहत बदला जा रहा है, उसे सामान्य सामाजिक या आर्थिक परिवर्तन

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अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति – एक अंतरराष्ट्रीय नैतिक संकट

भूमिका: उपमहाद्वीप में बहुसंख्यकवाद की उग्रता और अल्पसंख्यकों की त्रासदी दक्षिण एशिया — विशेषकर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश — एक समय धर्मनिरपेक्ष विविधता का घर हुआ करता था। इन देशों की रचना में अनेक धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों ने भूमिका निभाई थी। परन्तु समय के साथ, इन राष्ट्रों की राजनैतिक दिशा ने धार्मिक असहिष्णुता, कट्टरता

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भारत में मीडिया की विश्वसनीयता और वैकल्पिक मीडिया का उदय

भूमिका: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ खतरे में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन भारत में यह स्तंभ अब खुद डगमगाने लगा है। एक समय था जब अखबार और समाचार चैनल जनमानस की आवाज़ हुआ करते थे, लेकिन आज बड़े मीडिया घराने कार्पोरेट नियंत्रण, राजनीतिक दबाव, टीआरपी की भूख और सनसनी फैलाने

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भारत में जनसंख्या नियंत्रण और समान नागरिक संहिता

भूमिका: सामाजिक न्याय और एक राष्ट्र की अवधारणा की कसौटी पर भारत एक बहुजातीय, बहुधार्मिक और बहुभाषी राष्ट्र है, जिसकी विविधता इसकी ताकत भी है और चुनौती भी। स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी जब नागरिकों के अधिकार और कर्तव्यों में एकरूपता नहीं है, तो यह संविधान की आत्मा पर एक सवालिया निशान है। समान

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भारत में धार्मिक स्थानों की जमीन पर कब्ज़ा और वक्फ संपत्ति विवाद

भूमिका: वक्फ संपत्ति का मूल उद्देश्य और वर्तमान संकट भारत में वक्फ संपत्तियों का इतिहास सैकड़ों वर्षों पुराना है, जो मुस्लिम समाज की धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक और मानवतावादी जरूरतों को पूरा करने के लिए दान में दी गई थीं। इन संपत्तियों का उद्देश्य ज़कात और इबादत से जुड़ा था — यानी इन्हें मस्जिदों, मदरसों, कब्रिस्तानों,