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राहुल बनाम ‘एंटायर पॉलिटिकल साइंस’ : बाइक से भारी कार नहीं, सत्ता का अहंकार, यही तो है ‘न्यू इंडिया’ का बौद्धिक स्तर

नई दिल्ली 4 अक्टूबर 2025 बीजेपी की राजनीति जिस बौद्धिक धरातल पर खड़ी है, उसका अंदाज़ा उसके शीर्ष नेतृत्व के बयानों से लगाया जा सकता है। वही पार्टी, जिसके नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी गर्व से कहा था कि “बादल रहेगा तो रडार नहीं पकड़ पाएगा।” और एक दिन वह भी आया जब

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अमेरिकी शटडाउन: अंतरराष्ट्रीय छात्रों और प्रवासी समुदाय के लिए बढ़ती अनिश्चितता

डॉ. अखलाक अहमद उस्मानी | नई दिल्ली 3 अक्टूबर 2025 अमेरिका में सरकार का शटडाउन होना कोई नई बात नहीं है। यह अक्सर बजट पर सहमति न बनने या राजनीतिक खींचतान के कारण होता है। लेकिन इसका सबसे बड़ा असर उन पर पड़ता है जिनका जीवन प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर निर्भर है — यानी प्रवासी समुदाय,

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Modi Vs Rahul : मैं तो रास्ते से जा रहा था, भेलपुरी खा रहा था… तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं?

नई दिल्ली 3 अक्टूबर 2025 भारतीय राजनीति में एक पुरानी कहावत है—“सच बोला तो चोट लगेगी।” यही आज राहुल गांधी और बीजेपी के बीच की बहस में देखने को मिल रहा है। राहुल गांधी ने कोलंबिया की यूनिवर्सिटी में जाकर कहा कि भारत के लोकतंत्र पर हमला हो रहा है। यह बात उन्होंने किसी निजी

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भिश्ती बादशाह: जब दिल्ली में चले चमड़े के सिक्के और आज की सच्चाई…”राष्ट्राय स्वाहा!”

बात पुरानी है। मुगल अभी भारत में पैर नहीं जमा पाए थे। बाबर ने 1526 में पानीपत की लड़ाई जीती, लेकिन चार साल बाद ही चल बसे। गद्दी पर उनका बेटा हुमायूं बैठा। उस समय दिल्ली और पंजाब के कुछ इलाके ही उसके पास थे। चुनौती दे रहा था फरीद खान—उर्फ़ शेरशाह सूरी। वही शेरशाह

जो निडर थे वो जंग में गए, जो कायर थे वो संघ में गए

नई दिल्ली 3 अक्टूबर 2025 आज़ादी की कहानी: जनबल, बलिदान और इतिहास का अलिखित पक्ष भारत का स्वतंत्रता संग्राम दुनिया के सबसे बड़े, सबसे जटिल और सबसे बलिदानी सामूहिक आंदोलनों में से एक था। यह कोई साधारण राजनीतिक मुहिम नहीं थी बल्कि करोड़ों लोगों का रणनीतिक, नैतिक और व्यक्तिगत बलिदान था — किसानों का धरना,

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महात्मा गांधी होना क्या होता है? बापू की विरासत और जीवित आदर्श

लेखक : निपुणिका शाहिद, असिस्टेंट प्रोफेसर, क्राइस्ट यूनिवर्सिटी  | नई दिल्ली 2 अक्टूबर 2025 गांधी होना एक विचार है, व्यक्ति नहीं महात्मा गांधी होना क्या होता है? यह सवाल हमें केवल इतिहास की गलियों में नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान और भविष्य की गहराई में झाँकने को मजबूर करता है। गांधी होना केवल एक व्यक्ति का

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष: विचार, संघर्ष और परिवर्तन की सदी

डॉ. शालिनी अली, समाजसेवी | नई दिल्ली 2 अक्टूबर 2025 सौ वर्षों का अद्भुत सफ़र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उस समय यह संगठन मात्र कुछ स्वयंसेवकों के साथ शुरू हुआ था, जिसका उद्देश्य हिंदू समाज को एकजुट करना और राष्ट्रीय

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लाल बहादुर शास्त्री: सादगी, सत्यनिष्ठा और शौर्य के प्रतीक

लेखक : इंशा रहमान, स्टूडेंट ऑफ लॉ एक साधारण इंसान, असाधारण नेता भारत की राजनीति में जहाँ बड़े-बड़े नेताओं की चमक अक्सर आम आदमी की आँखें चकाचौंध कर देती है, वहीं लाल बहादुर शास्त्री उस अपवाद के रूप में सामने आते हैं जिनका जीवन हमें बताता है कि महानता दिखावे में नहीं, बल्कि सेवा और

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संयुक्त राष्ट्र के मंच और पाकिस्तान का कश्मीर राग

लेखक : डॉ. शुजात अली क़ादरी (मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इंडिया (MSO) के राष्ट्रीय अध्यक्ष। सूफ़ीवाद, सार्वजनिक नीति, भू-राजनीति और सूचना युद्ध जैसे विषयों पर लिखते हैं) नई दिल्ली 1 अक्टूबर 2025 क्या किसी को याद है कि पाकिस्तान का कोई प्रधानमंत्री, या प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में उसका कोई प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्र (UN) में जाकर

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ओपिनियन | ट्रम्प की गाज़ा शांति योजना: क्या यह सचमुच शांति का रास्ता है या फिर एक और खोखला वादा?

नई दिल्ली 1 अक्टूबर 2025 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गाज़ा संकट को सुलझाने के लिए 20 बिंदुओं पर आधारित एक शांति प्रस्ताव रखा है। कागज़ पर यह योजना भले ही “आशा” जैसी दिखे, लेकिन ज़मीन पर इसे लागू करना उतना ही कठिन है जितना रेगिस्तान में नखलिस्तान खोजना। कारण साफ़ है — यह योजना