अखलाक अहमद | नई दिल्ली 22 नवंबर 2025
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने देश की राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर एक बेहद गंभीर टिप्पणी की है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश के सर्वोच्च कार्यकारी पद पर बैठे व्यक्ति—यानी कि प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति पद के समकक्ष राष्ट्रीय नेतृत्व—ने विपक्षी नेताओं पर देशद्रोह और राजद्रोह जैसे संगीन अपराधों के आरोप लगाए हैं। चिदंबरम ने कहा कि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति होती है जब सत्ता में बैठा व्यक्ति विपक्ष को “देशद्रोही” और “देश के खिलाफ काम करने वाला” करार देता है, वह भी बिना किसी ठोस सबूत या न्यायिक प्रक्रिया के। चिदंबरम के अनुसार, यह न केवल राजनीतिक रूप से खतरनाक है बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ भी है, क्योंकि विपक्ष किसी भी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ होता है और उसे देशद्रोह की भाषा में परिभाषित करना लोकतांत्रिक असहमति पर हमला है।
उन्होंने कहा कि देश के कार्यकारी प्रमुख ने विपक्षी नेताओं पर “देशद्रोही और गद्दार” होने का आरोप लगाते हुए यह तक कहा कि यह “देशद्रोही आचरण है, जिसकी सजा मौत है।” चिदंबरम ने इस बयान को बेहद घातक और उकसाने वाला करार दिया। उन्होंने कहा कि जब सत्ता का शीर्ष व्यक्ति ऐसी भाषा का इस्तेमाल करता है, तो उसका असर केवल भाषण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज में मौजूद कट्टर समर्थक उस भाषा को हिंसा की वैधता मान सकते हैं। चिदंबरम ने चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसी बयानबाज़ी उन समर्थकों को हिंसक कदम उठाने की प्रेरणा दे सकती है जो किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा के प्रति अंधभक्ति रखते हैं। उनके शब्दों में, यह सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि असहमति और विरोध की आवाज़ को दबाने की एक खतरनाक रणनीति है।
उन्होंने आगे कहा कि विपक्ष के नेता ने भी मीडिया से बात करते हुए यही चिंता जताई कि जब शीर्ष नेतृत्व सार्वजनिक रूप से “फाँसी”, “देशद्रोह”, और “गद्दारी” जैसी शब्दावली का उपयोग करता है, तो उसके समर्थक उसे एक आदेश या संकेत की तरह ले सकते हैं। विपक्षी नेता ने कहा, “जब वह फाँसी और देशद्रोह की भाषा का उपयोग करता है, तो इसके समर्थक सचमुच उस पर अमल कर सकते हैं। वह एक ऐसे देश में चिंगारी लगा रहा है जो पहले ही राजनीतिक बारूद से भरा हुआ है।” यह बयान इस बात को रेखांकित करता है कि राजनीतिक ध्रुवीकरण जिस स्तर पर पहुँच चुका है, वहाँ किसी भी प्रकार की उकसाऊ भाषा सामूहिक हिंसा, टकराव और अस्थिरता को जन्म दे सकती है।
पी. चिदंबरम ने इस पूरी स्थिति को लेकर देश की लोकतांत्रिक छवि पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कोई भी देश जो खुद को “पुराना और विशाल लोकतंत्र” कहता है, उसके लिए ऐसे आरोप और ऐसी भाषा एक काला धब्बा हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र केवल चुनाव लड़ने और सरकार बनाने का नाम नहीं है, बल्कि यह असहमति, आलोचना और विचारों की स्वतंत्रता का सम्मान करने से संचालित होता है। यदि सत्ता dissent को देशद्रोह मानने लगे और विपक्ष को राष्ट्रविरोधी घोषित करने लगे, तो लोकतांत्रिक ढाँचा कमजोर होता है और लोकतंत्र एक औपचारिक ढाँचा भर रह जाता है। चिदंबरम ने चेतावनी दी कि ऐसे आरोप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाते हैं और यह संदेश देते हैं कि देश में लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर हो चुकी हैं और राजनीतिक असहमति को दबाया जा रहा है।
कुल मिलाकर, चिदंबरम का बयान सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सेहत और राजनीतिक भाषा के प्रभाव को लेकर एक गंभीर चेतावनी है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि शीर्ष नेतृत्व ऐसे शब्दों का चयन करता रहा और विपक्ष को दुश्मन के रूप में पेश करता रहा, तो देश की राजनीति संवाद और सहमति की संस्कृति से हटकर संघर्ष और हिंसा की दिशा में बढ़ सकती है। यह स्थिति न केवल राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करेगी बल्कि सामाजिक ताने-बाने और लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी गहरा आघात करेगी।




