अंतरराष्ट्रीय | हनुमान मिश्रा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 मई 2026
नई दिल्ली में आयोजित BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक ने वैश्विक राजनीति को बड़ा संदेश देते हुए “स्वतंत्र और व्यवहार्य फिलिस्तीन राष्ट्र” के समर्थन को दोहराया है। BRICS देशों ने स्पष्ट रूप से कहा कि फिलिस्तीन को 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा मिलना चाहिए और पूर्वी यरुशलम उसकी राजधानी होनी चाहिए। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया युद्ध, गाजा संकट और ईरान-अमेरिका तनाव से दुनिया अस्थिर है, BRICS का यह रुख अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। लेकिन फिलिस्तीन मुद्दे पर व्यापक सहमति बनने के बावजूद BRICS देशों के बीच कई अहम विषयों पर गंभीर मतभेद भी सामने आए। यही वजह रही कि बैठक के अंत में संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका और उसकी जगह केवल “चेयर स्टेटमेंट और आउटकम डॉक्यूमेंट” जारी किया गया। सूत्रों के मुताबिक गाजा पट्टी के भविष्य, ईरान की भूमिका, संयुक्त अरब अमीरात के साथ तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच एकमत नहीं बन पाया।
बैठक के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करते हुए कहा कि फिलिस्तीन मुद्दे का स्थायी समाधान बातचीत और शांतिपूर्ण प्रक्रिया से ही संभव है। भारत ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि वह स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र के समर्थन की अपनी पारंपरिक नीति पर कायम है। लेकिन साथ ही भारत ने आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता को भी महत्वपूर्ण मुद्दा बताया।
इस बार BRICS बैठक केवल फिलिस्तीन तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह मंच पश्चिम एशिया में बदलते शक्ति संतुलन का आईना भी बन गया। ईरान और यूएई के बीच तनाव खुलकर सामने आया। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अपने और ओमान के “क्षेत्रीय जलक्षेत्र” का हिस्सा बताते हुए उस पर अधिकार का दावा दोहराया, जबकि कई सदस्य देशों ने वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। यही वह मुद्दा था जिस पर BRICS देश एकमत नहीं हो पाए।
विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठक दिखाती है कि BRICS अब केवल आर्थिक मंच नहीं रह गया है, बल्कि वह वैश्विक राजनीतिक और रणनीतिक मुद्दों पर भी पश्चिमी देशों के विकल्प के रूप में खुद को पेश करना चाहता है। खासतौर पर अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान संघर्ष के बीच BRICS देशों की भूमिका लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। चीन और रूस जहां खुले तौर पर पश्चिमी दबाव की आलोचना कर रहे हैं, वहीं भारत संतुलित कूटनीतिक रुख बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
दिलचस्प बात यह भी है कि BRICS देशों के भीतर अब नई भू-राजनीतिक खींचतान दिखाई देने लगी है। एक तरफ ईरान और कुछ देश इजरायल के खिलाफ सख्त रुख चाहते हैं, वहीं यूएई जैसे देश क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं। भारत भी खुलकर किसी सैन्य धड़े का हिस्सा बनने से बच रहा है। यही कारण है कि फिलिस्तीन पर सहमति के बावजूद व्यापक संयुक्त बयान तैयार नहीं हो सका।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार BRICS की यह बैठक कई मायनों में ऐतिहासिक रही। पहली बार ऐसा साफ दिखाई दिया कि वैश्विक दक्षिण यानी “ग्लोबल साउथ” अब पश्चिमी शक्तियों के एजेंडे से अलग अपनी स्वतंत्र कूटनीतिक लाइन तैयार कर रहा है। फिलिस्तीन मुद्दे पर BRICS का स्पष्ट समर्थन अमेरिका और इजरायल के लिए भी एक बड़ा संदेश माना जा रहा है कि दुनिया का बड़ा हिस्सा अब दो-राष्ट्र समाधान को ही स्थायी विकल्प मानता है।
इसके साथ ही यह बैठक यह भी दिखाती है कि BRICS के भीतर एकता जितनी दिखाई देती है, वास्तविकता उतनी सरल नहीं है। ऊर्जा, सुरक्षा, समुद्री नियंत्रण, ईरान नीति और पश्चिम एशिया संकट जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के अपने-अपने रणनीतिक हित हैं। यही वजह है कि मंच पर एकजुटता के बावजूद अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं।
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि BRICS अब वैश्विक राजनीति में केवल आर्थिक गठबंधन नहीं बल्कि वैकल्पिक शक्ति केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। फिलिस्तीन पर उसका यह सामूहिक रुख आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र और पश्चिम एशिया की राजनीति पर भी असर डाल सकता है।




