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टूटता संतुलन: भारतीय राजनीति में घटता मुस्लिम प्रतिनिधित्व और बढ़ती दूरियाँ

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 24 जनवरी 2026

इंट्रो: अतीत और वर्तमान के बीच बढ़ती दूरी

भारत का लोकतंत्र हमेशा अपनी विविधता और समावेशी चरित्र के लिए जाना जाता रहा है। यही विविधता संसद और विधानसभाओं में भी दिखाई देती थी, जहां अलग-अलग समुदायों की भागीदारी लोकतांत्रिक संतुलन को मजबूत बनाती थी। अगर अतीत और वर्तमान की तुलना करें तो यह बदलाव स्पष्ट नजर आता है। इंदिरा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री के दौर में मुस्लिम प्रतिनिधित्व भले ही जनसंख्या के अनुपात से कम था, लेकिन राजनीतिक भागीदारी का एक भरोसा कायम था। 1980 में लोकसभा में 49 मुस्लिम सांसद चुने गए, जो लगभग 9 प्रतिशत प्रतिनिधित्व था, जबकि उस समय मुस्लिम आबादी करीब 11 प्रतिशत थी। इसके विपरीत 2024 की लोकसभा में यह संख्या घटकर 24 रह गई, यानी लगभग 4.4 प्रतिशत, जबकि मुस्लिम आबादी 14 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है। यह तुलना बताती है कि प्रतिनिधित्व और जनसंख्या के बीच की दूरी समय के साथ बढ़ी है, जो केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक संकेत भी देती है।

लोकतंत्र की खूबसूरती और बदलता राजनीतिक माहौल

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है और इसकी असली ताकत उसकी विविधता रही है। अलग-अलग धर्म, भाषा और संस्कृतियों के बीच सहअस्तित्व ने देश को मजबूत बनाया है। लेकिन हाल के वर्षों में राजनीति के भीतर ऐसा बदलाव दिखाई दे रहा है, जिसने इस संतुलन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का लगातार कम होना केवल आंकड़ों का विषय नहीं बल्कि लोकतांत्रिक समावेशन के कमजोर पड़ने का संकेत भी है।

अतीत का संतुलन: जब प्रतिनिधित्व में भरोसा दिखता था

आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में मुस्लिम प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुपात से कम जरूर था, लेकिन राजनीतिक भागीदारी का एक भरोसा बना हुआ था। लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के दौर में लोकसभा में मुस्लिम सांसदों की संख्या लगभग 4 से 9 प्रतिशत के बीच रही। 1980 में 49 मुस्लिम सांसद चुने गए, जो लोकसभा का करीब 9 प्रतिशत था। उस समय मुस्लिम आबादी लगभग 11 प्रतिशत थी, इसलिए प्रतिनिधित्व और सामाजिक हिस्सेदारी के बीच एक संतुलन महसूस होता था।

वर्तमान तस्वीर: बढ़ती आबादी, घटती राजनीतिक भागीदारी

2024 की 18वीं लोकसभा में केवल 24 मुस्लिम सांसद चुने गए, जो कुल सदन का लगभग 4.4 प्रतिशत है, जबकि देश में मुस्लिम आबादी 14 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है। यह अंतर केवल संख्या का नहीं बल्कि उस विश्वास का भी है जो किसी समुदाय को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ता है। जब आबादी और प्रतिनिधित्व के बीच दूरी बढ़ती है तो राजनीतिक अलगाव और असुरक्षा की भावना भी बढ़ने लगती है।

ध्रुवीकरण की राजनीति और टिकट देने में हिचक

इस गिरावट के पीछे सबसे प्रमुख कारण बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण माना जाता है। 1990 के दशक के बाद चुनावी राजनीति में पहचान आधारित विमर्श मजबूत हुआ, जिसमें बहुसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण अहम रणनीति बन गया। ऐसे माहौल में कई राजनीतिक दल मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने से हिचकने लगे, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि इससे बहुसंख्यक मतदाताओं में गलत संदेश जा सकता है। नतीजतन प्रतिनिधित्व का सवाल चुनावी गणित के पीछे छूटता चला गया।

2024 चुनाव: आंकड़े जो नई चिंता पैदा करते हैं

2024 के चुनावों में प्रमुख दलों द्वारा मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या पहले की तुलना में कम रही और सत्ता पक्ष के बड़े गठबंधन से कोई मुस्लिम सांसद नहीं चुना गया। विपक्षी दलों में भी टिकट वितरण में संकोच दिखाई दिया। जिन राज्यों में मुस्लिम आबादी बड़ी है, वहां भी उम्मीदवारों की संख्या सीमित रही। यह स्थिति बताती है कि चुनावी रणनीति ने समावेशी प्रतिनिधित्व की राजनीति को कमजोर किया है।

कम प्रतिनिधित्व का सामाजिक और राजनीतिक असर

जब किसी समुदाय की राजनीतिक आवाज कम होती है तो उससे जुड़े सामाजिक और आर्थिक मुद्दे भी बहस के केंद्र में कम दिखाई देते हैं। शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और सामाजिक भागीदारी जैसे विषय धीरे-धीरे हाशिये पर चले जाते हैं। इससे अलगाव की भावना पैदा होती है, जो समाज के लिए लंबे समय में चुनौती बन सकती है। लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव जीतने से नहीं बल्कि सभी वर्गों के भरोसे और भागीदारी से तय होती है।

ध्रुवीकरण का नुकसान: समाज में बढ़ती दूरियाँ

ध्रुवीकरण किसी एक समुदाय को नहीं बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करता है। जब राजनीति पहचान के आधार पर विभाजित होती है तो आपसी विश्वास कमजोर होता है और सामाजिक तनाव बढ़ता है। भारत जैसे बहुलतावादी समाज में यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चुनौती बन सकती है। इसलिए राजनीति की जिम्मेदारी केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं बल्कि सामाजिक संतुलन बनाए रखना भी है।

समाधान का रास्ता: समावेशी राजनीति की जरूरत

स्थिति कठिन जरूर है, लेकिन इसका समाधान संभव है। राजनीतिक दलों को टिकट वितरण और नेतृत्व निर्माण में विविधता को प्राथमिकता देनी होगी ताकि संसद और विधानसभाओं में समाज की वास्तविक तस्वीर दिखाई दे। चुनावी सुधार, संवाद की संस्कृति और नफरत फैलाने वाली भाषा से दूरी—ये सभी कदम भरोसा बहाल करने में मदद कर सकते हैं।

विविधता ही भारत की असली ताकत

भारत की ताकत उसकी विविधता और सहअस्तित्व में ही है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब हर वर्ग को यह महसूस हो कि उसकी आवाज सुनी जा रही है और उसका सम्मान है। घटता प्रतिनिधित्व एक चेतावनी है कि हमें अपने लोकतांत्रिक मूल्यों को फिर से मजबूत करने की जरूरत है। समावेशी राजनीति केवल आदर्श नहीं बल्कि भारत जैसे देश के लिए अनिवार्यता है, क्योंकि यही विश्वास, एकता और स्थिरता की नींव है।

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