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शवदान या सैन्य सौदा? अमेरिका में खुलासे से मचा बवाल, इज़राइली सैन्य प्रशिक्षण में इस्तेमाल हुए दान किए गए शव!

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | लॉस एंजिलिस | 3 जून 2026

अमेरिका में शवदान कार्यक्रम को लेकर एक ऐसा खुलासा सामने आया है जिसने चिकित्सा जगत, विश्वविद्यालयों और मानवाधिकार समूहों के बीच तीखी बहस छेड़ दी है। एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चिकित्सा शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर दान किए गए मानव शवों का इस्तेमाल अमेरिकी नौसेना और इज़राइली सैन्य चिकित्सा टीमों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया (USC) ने वर्ष 2018 से कम से कम 89 शव अमेरिकी नौसेना को उपलब्ध कराए। आरोप है कि इन शवों का उपयोग उन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हुआ जिनमें इज़राइली सैन्य सर्जनों को युद्धक्षेत्र में गंभीर घायलों के उपचार की विशेष ट्रेनिंग दी गई।

सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर खड़ा हुआ है कि शव दान करने वाले लोगों और उनके परिवारों को कथित तौर पर कभी नहीं बताया गया कि उनके प्रियजनों के शरीर का उपयोग विदेशी सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी किया जा सकता है। कई परिवारों ने इसे विश्वासघात करार दिया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रशिक्षण के दौरान शवों में कृत्रिम रक्त प्रवाहित कर उन्हें लगभग जीवित जैसी स्थिति में लाया जाता था। इसके बाद गोली लगने, विस्फोट और युद्ध संबंधी गंभीर चोटों की परिस्थितियां बनाकर सैन्य चिकित्सकों को अभ्यास कराया जाता था। आलोचकों का कहना है कि यह सामान्य मेडिकल शिक्षा से कहीं आगे की प्रक्रिया है और इसके लिए स्पष्ट सहमति आवश्यक थी।

जांच में यह भी सामने आया कि यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो (UCSD) से भी बड़ी संख्या में शव इस कार्यक्रम के लिए भेजे गए। छात्र पत्रकारों की रिपोर्ट के अनुसार 2024 से 2026 के बीच 124 शव UCSD से USC को हस्तांतरित किए गए।

मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब कुछ दानदाताओं के परिवारों ने कहा कि उनके परिजनों ने मानवता और चिकित्सा अनुसंधान की सेवा के उद्देश्य से शरीर दान किया था, न कि किसी सैन्य अभियान या युद्ध प्रशिक्षण का हिस्सा बनने के लिए। कई परिवार अब विश्वविद्यालयों से जवाब और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।

हालांकि USC और UCSD ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि यह कार्यक्रम शैक्षणिक और चिकित्सकीय प्रशिक्षण का हिस्सा था तथा इसका उद्देश्य युद्धक्षेत्र में जीवन बचाने की क्षमता विकसित करना था। अमेरिकी नौसेना का भी कहना है कि यह प्रशिक्षण अत्यंत जटिल चिकित्सा परिस्थितियों से निपटने के लिए सर्जनों को तैयार करने हेतु आयोजित किया जाता है।

इस खुलासे के बाद कई संभावित दानदाताओं ने अपने शरीरदान के निर्णय वापस ले लिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल सैन्य प्रशिक्षण का नहीं बल्कि पारदर्शिता, सूचित सहमति और नैतिक जिम्मेदारी का भी है।

अब सवाल यह है कि क्या विश्वविद्यालयों ने दानदाताओं को पूरी जानकारी दी थी, या फिर चिकित्सा अनुसंधान के नाम पर शवों का उपयोग ऐसे उद्देश्यों के लिए किया गया जिनसे परिवार पूरी तरह अनजान थे। यही प्रश्न इस पूरे विवाद के केंद्र में है।

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