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लोकतंत्र और संविधान की कब्र खोदने पर तुली बीजेपी: कांग्रेस

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महेंद्र सिंह। 30 नवंबर 2025

शीतकालीन सत्र : लोकतांत्रिक हत्या का नया अध्याय

कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा है कि केंद्र की सत्ता आज उस रास्ते पर चल पड़ी है, जहां लोकतंत्र का स्थान आदेश, बहस का स्थान चुप्पी और संविधान का स्थान मनमर्जी ले रही है। कांग्रेस का आरोप है कि लोकतंत्र की जड़ें कमजोर करने की यह प्रक्रिया अचानक नहीं हुई, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे एक ऐसी प्रणाली तैयार की गई है जिसमें सरकार सवालों से बचती है, संस्थाएं दबाव में झुकती हैं और संसद—जो जनता की आवाज़ का सबसे बड़ा मंच है—केवल एक साइनिंग बॉडी बनकर रह जाती है। पार्टी का कहना है कि बीजेपी ने प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र पर इस तरह से नियंत्रण स्थापित कर लिया है कि अब संसदीय परंपराओं का बचा-खुचा सम्मान भी समाप्त होता जा रहा है। शीतकालीन सत्र का छोटा होना उसी प्रक्रिया की अगली कड़ी है।

कांग्रेस नेताओं के अनुसार शीतकालीन सत्र को केवल 19 दिनों तक सीमित करना और उसमें भी वास्तविक चर्चा के लिए मात्र 15 दिन का समय तय करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सरकार देश के गंभीर और संवेदनशील मुद्दों पर विपक्ष की आवाज़ सुनने को तैयार नहीं है। विपक्ष का तर्क है कि संसद का मूल उद्देश्य ही बहस, संवाद और जवाबदेही है—लेकिन जब सत्र छोटा कर दिया जाता है, जब कोई बिल बिना चर्चा के पास कराया जाता है, जब विपक्ष को वक्तव्य देने का पूरा अवसर नहीं मिलता, तब यह केवल ‘उपस्थिति दर्ज कराने’ का मंच बनकर रह जाता है। कांग्रेस का दावा है कि यही बीजेपी की रणनीति है—बहस को खत्म करो, सवालों को दबा दो, और संविधान की आत्मा को धीरे-धीरे खत्म कर दो।

विपक्ष ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह लड़ाई किसी एक राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक आत्मा की रक्षा की लड़ाई है। कांग्रेस का आरोप है कि आज देश ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता तक, हर क्षेत्र में सवालों का ढेर लगा है, लेकिन सरकार उत्तर देने के बजाय विपक्ष की आवाज़ को ‘विघ्न’ बताकर चुप कराने की कोशिश में जुटी है। उदाहरणस्वरूप, दिल्ली में हाल ही में हुए धमाके को कांग्रेस ने गृह मंत्रालय की सीधी नाकामी करार देते हुए कहा कि यदि ऐसी गंभीर सुरक्षा चूक पर संसद में चर्चा नहीं होगी, तो फिर किस मुद्दे पर होगी? उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय का मौन बताता है कि सरकार ‘सुरक्षा’ के नाम पर राजनीति तो करती है लेकिन जब जवाबदेही की बात आती है तो हर सवाल से मुंह मोड़ लेती है।

इसी तरह चुनाव आयोग पर कांग्रेस द्वारा लगाए गए राजनीतिक पक्षपात के आरोपों ने लोकतंत्र की जड़ पर एक और सवाल खड़ा कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि अगर चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं दिखेगा, अगर वोटर लिस्ट से छेड़छाड़ की आशंकाएं बढ़ेंगी, अगर चुनाव सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठेंगे, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता कैसे बचेगी? कांग्रेस का कहना है कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थानों पर बढ़ता राजनीतिक प्रभाव इस बात का संकेत है कि चुनाव अब सत्ता द्वारा नियंत्रित प्रक्रिया बनते जा रहे हैं, न कि जनता की स्वतंत्र अभिव्यक्ति।

कांग्रेस ने बढ़ते वायु प्रदूषण को ‘स्वास्थ्य आपदा’ बताते हुए कहा कि करोड़ों लोग श्वास संबंधी बीमारियों से जूझ रहे हैं, बच्चों की फेफड़ों की क्षमता प्रभावित हो रही है, लेकिन केंद्र सरकार की भूमिका केवल बयानों तक सीमित रह गई है। हर साल की तरह इस साल भी दिल्ली और उत्तर भारत की हवा जहरीली हो गई है, और पर्यावरण, स्वास्थ्य, शहरी प्रबंधन, परिवहन और औद्योगिक उत्सर्जन—इन सभी मोर्चों पर केंद्र सरकार की योजनाएँ नदारद हैं। विपक्ष का सवाल है कि जब सार्वजनिक स्वास्थ्य इतनी गंभीर स्थिति में पहुंच चुका है, तब भी अगर सरकार चर्चा से बचती है, तो यह जनता के प्रति सबसे बड़ा अन्याय है।

किसानों और श्रमिकों के मुद्दों पर भी कांग्रेस ने सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि करोड़ों किसान आज फसलों के उचित दाम न मिलने से टूट चुके हैं। MSP कानून पर सरकार की चुप्पी, कर्ज के बोझ से लदे गांव, बारिश-बाढ़ से तबाह हुई फसलें—ये सब ऐसे प्रश्न हैं जिन पर संसद में समग्र चर्चा अनिवार्य है। लेकिन सत्र को छोटा कर देना यह संकेत है कि सरकार किसानों की आवाज़ सुनना ही नहीं चाहती। श्रमिकों की सुरक्षा पर कांग्रेस ने कहा कि देश की फैक्ट्रियों में हादसे बढ़ रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस कानून या सुधार सामने नहीं आते। यह आर्थिक सुरक्षा पर सरकार की असंवेदनशीलता को उजागर करता है।

प्राकृतिक आपदाओं पर कांग्रेस ने कहा कि बढ़ती बाढ़, भूस्खलन और चक्रवात यह संकेत दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती अब सिर पर खड़ी है, लेकिन सरकार की तैयारी लगभग शून्य है। उन्होंने आरोप लगाया कि हर साल राहत घोषणाओं के अलावा सरकार के पास कोई दीर्घकालिक, वैज्ञानिक आपदा प्रबंधन नीति नहीं दिखती। विपक्ष ने पूछा—क्या सरकार हर आपदा को ‘भगवान का लिखा भाग्य’ मान चुकी है?

विदेश नीति के सवाल पर भी कांग्रेस का रुख बेहद कठोर था। उनका आरोप है कि मोदी सरकार ने भारत की विदेश नीति को मजबूरी की नीति बना दिया है, जिसमें पड़ोसी देशों से लेकर वैश्विक शक्तियों तक, हर मंच पर भारत को अपने हितों की बजाय दूसरे देशों के दबाव में झुकना पड़ रहा है। कांग्रेस ने कहा कि यह वह विदेश नीति नहीं है जिसकी कल्पना भारत के पहले प्रधानमंत्रियों ने की थी, यह वह आत्मविश्वास नहीं है जिसकी उम्मीद दुनिया भारत से करती है।

गौरव गोगोई ने कहा कि यह सत्र केवल 19 दिन का भले हो, लेकिन लोकतंत्र की परीक्षा उससे कहीं लंबी और गहरी है। विपक्ष ने साफ चेतावनी दी है कि वे लोकतांत्रिक मर्यादा, संविधान की संरचना और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक लड़ाई लड़ेंगे। उनका कहना है कि अगर संसद ही मौन कर दी जाएगी, तो लोकतंत्र की सांसें कैसे चलेंगी? और इसलिए कांग्रेस का यह बयान सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—कि लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है।

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