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बिहार के ऐसे गांव जहाँ पुरुष दिखते ही नहीं — माइग्रेशन की छाया में महिलाएँ, घर और ज़िम्मेदारी

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जहानाबाद/ पटना 12 नवंबर 2025

बिहार के ग्रामीण इलाकों में शानदार जीवन की तस्वीर नहीं बल्कि एक उलझी-परिस्थिति का प्रतिबिंब नजर आता है — ऐसे गांव जहाँ पति, भाई और बेटा बाहर चले गए हैं काम की तलाश में, और घरों में महिलाएँ, बुज़ुर्ग तथा बच्चे रह गए हैं। इन खाली-पुरुष (men-absent) गांवों में महिलाएँ सिर्फ घरेलू काम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि खेतों की हल चलाती हैं, परिवार चलाती हैं, और सामाजिक दायित्वों का बोझ उठाती हुई दिन काट रही हैं। हालांकि यह बदलाव उन्हें स्वायत्तता भी दे रहा है, लेकिन इसके साथ चुनौतियाँ और जोखिम भी गहराई से जुड़े हैं।

सामाजिक संरचना बदल रही है — लेकिन चुनौतियाँ कम नहीं

पुरुषों के मेट्रो-शहरों या दूसरे राज्यों में रोजगार के कारण लंबे समय तक घर से दूर रहने की प्रवृत्ति ने बिहार की ग्रामीण-परिस्थितियों को पूरी तरह बदल दिया है। उदाहरण के लिए, मिथिला-कोसी-सीमांचल क्षेत्र में खेतों में केवल महिलाएँ काम करती दिखती हैं क्योंकि पुरुष मजदूरी के लिए पंजाब, हरियाणा या महानगरों की ओर चले गए हैं। 

इस बदलाव का एक पहलू यह है कि महिलाएँ पारंपरिक भूमिकाओं से आगे निकल आई हैं — वे परिवार की देखभाल के साथ-साथ खेत-बारी, ऋण-लेन-देने, घर-निर्माण और सामाजिक निर्णयों में सक्रिय हो रही हैं। 

लेकिन इस तस्वीर के दूसरे पहलू में चुनौतियाँ हैं: पुरुषों के निकलने से जिन घरों में कोई स्थायी पुरुष नहीं रहता, वहाँ काम का बोझ, अकेलापन, सामाजिक असुरक्षा, बच्चों-बुज़ुर्गों की देखभाल जैसे मसले गहराते जा रहे हैं। एक अध्ययन में यह देखा गया है कि पुरुष-माइग्रेशन के कारण महिलाएँ अधिक कार्यभार से जूझती हैं और कभी-कभी उन्हें पर्याप्त आर्थिक और सामाजिक समर्थन नहीं मिल पाता। 

महिलाएँ अकेली नहीं, पर साथ नहीं है पति-परिवार की शक्ति

जब पुरुष घर से दूर रहते हैं, तो महिलाएँ घरेलू निर्णयों में आगे आ जाती हैं — क्या बोएँ, कितना खर्च करें, बच्चों की पढ़ाई-स्वास्थ्य पर ध्यान दें, ये सभी जिम्मेदारियाँ अब उन्हीं के कंधों पर आ जाती हैं। 

एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि महिलाएँ अक्सर चाहती हैं कि पुरुष काम के लिए बाहर जाएँ क्योंकि उन्हें लगता है कि पुरुष घर में रहने पर आलस्य, शराब या जुआ जैसी आदतों में फँस सकते हैं। 

पर इस स्वायत्तता की कीमत भी है — अकेले निर्णय लेने का बोझ, सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा, पुरुषों के बिना घर-परिवार चलाने की जद्दोजहद। तथा जब आखिरकार पुरुष वापस आते हैं, तो पारिवारिक शक्ति-सामंजस्य फिर से चुनौतीपूर्ण हो जाता है। 

माइग्रेशन: अवसर भी है, अभिशाप भी

माइग्रेशन ने निश्चय ही ग्रामीण परिवारों की अर्थव्यवस्था में बदलाव लाया है — बाहर काम जाकर पुरुषों द्वारा भेजे गए पैसे ने बच्चों की पढ़ाई-स्वास्थ्य और घरों की स्थिति में सुधार किया है। लेकिन यह अवसर तभी फलदायी हुआ है जब प्रवासी पुरुष नियमित रूप से घर को भुगतान करते रहे हैं। अगर रेमिटेंस अस्थिर हों, तो यही माइग्रेशन एक जोखिम-कारक बन जाती है, जिससे महिलाएँ अतिरिक्त जिम्मेदारियों के साथ-साथ आर्थिक अनिश्चितता में भी फँस जाती हैं। 

आगे की चुनौतियाँ — नीति-दृष्टि की जरूरत

यह स्थिति केवल सामाजिक-परिवारिक अवधारणा तक सीमित नहीं है; यह नीति-निर्माता, प्रशासनिक संरचना और ग्रामीण विकास की चुनौतियों से जुड़ी है। उदाहरणस्वरूप, जब पुरुष गाँव छोड़कर जाते हैं, तो स्थानीय श्रम-बल, कृषि उत्पादन, सामाजिक स्वास्थ्य और शिक्षा पर असर पड़ता है। सरकार और नीति-निर्माताओं को यह समझने की जरूरत है कि माइग्रेशन को केवल समस्या के रूप में नहीं देखना चाहिए बल्कि इसे समुचित अवसरों और संरचनात्मक समर्थन के माध्यम से प्रबंधित करना चाहिए — ताकि गाँव खाली न हों, महिलाएँ अकेली नहीं पड़ें, और सामाजिक-आर्थिक संतुलन बना रहे।

बिहार के “पुरुष-रहित” गांवों की तस्वीर हमें दिखाती है कि सामाजिक-आर्थिक बदलाव कितनी गहराई से हमारे गाँव-परिवारों को प्रभावित कर सकते हैं। जहाँ एक ओर महिलाएँ नई भूमिकाएँ अपना रही हैं, वहीं दूसरी ओर वह अकेलापन, असमर्थता और जोखिम से भी जूझ रही हैं, जो माइग्रेशन-प्रवृत्ति ने उत्पन्न किए हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विकास सिर्फ पैसों या रोजगार तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों के जीवन-लय, सामाजिक सुरक्षा और पारिवारिक संरचनाओं तक फैला हुआ है। यदि हम इन गाँवों की बदलती वास्तविकताओं को न समझें, तो सामाजिक असंतुलन और विकाश-विरोधी प्रवृत्तियाँ और तीव्र हो सकती हैं।

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