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बिहार चुनाव 2025: लोकतंत्र की हत्या का खुला खेल

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पटना 6 नवंबर 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण की वोटिंग ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर ऐसा प्रश्नचिह्न लगा दिया है, जिसकी गूंज अब खुलकर सामने आ रही है। मतदान के दिन ही कई इलाकों से लगातार यह आरोप उभर रहे हैं कि मतदाताओं को उनका संवैधानिक अधिकार प्रयोग नहीं करने दिया जा रहा। लोग बूथ तक पहुंच रहे हैं और उन्हें यह कहकर लौटा दिया जा रहा है कि “आपका वोट पहले ही पड़ चुका है।” यह बात केवल एक-दो जगह की नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर कई वीडियो और बयान सामने आए हैं, जिनमें लोग और राजनीतिक दल निर्वाचन आयोग पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं कि प्रशासन के समर्थन से मताधिकार छीना जा रहा है। इस तरह की परिस्थितियाँ केवल अनियमितता नहीं, बल्कि संगठित अभियान की आशंका को जन्म देती हैं, जिस पर चुनाव आयोग की चुप्पी अब भारी पड़ रही है।

पटना के दानापुर के नसीरगंज घाट से एक बेहद चौंकाने वाली शिकायत सामने आई — मतदाताओं को वहीं रोक दिया गया, नाव को मतदान केंद्र तक जाने की अनुमति नहीं दी गई। लोगों ने आरोप लगाया कि पुलिस जानबूझकर नाव को आगे नहीं बढ़ने दे रही थी, जिससे वोट डालने जा रहे नागरिक वापस लौटने पर मजबूर हो गए। सवाल यह है कि प्रशासन का काम मतदाता को सुरक्षा देना है या बाधा डालना? यह कोई isolated घटना नहीं, विपक्ष का कहना है कि कई इलाकों में बूथ तक पहुंचने से लेकर पहचान सत्यापन तक, हर चरण में व्यवस्थित तरीके से रुकावटें खड़ी की जा रही हैं। अगर मतदाता बूथ तक पहुंच ही न सके, तो चुनाव की पवित्रता क्या रह जाती है?

वहीं मुजफ्फरपुर सहित कई क्षेत्रों से यह आरोप सामने आए कि मतदाताओं की जगह फर्जी वोट पहले डाल दिए गए। असली मतदाताओं को यह कहकर वापस लौटा दिया गया कि “आपका वोट गिर चुका है।” यह प्रश्न लोकतंत्र को भीतर तक हिलाने वाला है — वोट किसका डाला गया? किसने यह हक छीना? क्या वोटर लिस्ट और मतदान व्यवस्था पूरी तरह किसी और के नियंत्रण में है? यह चिंताजनक माहौल इस ओर इशारा करता है कि कहीं न कहीं चुनावी प्रक्रिया में सत्ता का हस्तक्षेप गहरा और खतरनाक हो चुका है।

जाले विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. मस्कूर उस्मानी ने आरोप लगाया कि बूथ संख्या 135 पर EVM का 8 नंबर बटन — जो उनके चुनाव चिन्ह के लिए है — काम ही नहीं कर रहा है। उनका कहना है कि उन्होंने बार-बार शिकायत की, लेकिन चुनाव आयोग की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गई। यदि किसी विपक्षी उम्मीदवार को मिलने वाले वोट तकनीकी खराबी की आड़ में दर्ज ही नहीं हो रहे, तो यह लोकतंत्र के मूल ढांचे पर प्रहार है — चाहे इसे तकनीकी खराबी कहा जाए या राजनीतिक चाल। ऐसे माहौल में “एक भी वोट बिना गिने नहीं रहेगा” जैसे नारे खोखले पड़ जाते हैं।

महिलाओं और बुजुर्गों को लेकर भी दिल दहला देने वाले वीडियो सामने आए हैं, जहाँ वे घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद दुखी होकर बताते हैं कि उन्हें मतदान की अनुमति ही नहीं दी गई। एक महिला, जिसका नाम मतदाता सूची में स्पष्ट था और जिसके पास वैध पहचान पत्र भी था, का कहना है कि BLO ने डिजिटल स्लिप भेजी थी, लेकिन मतदान केंद्र पर उसे स्वीकार नहीं किया गया और अंततः उसे बिना वोट डाले वापस जाना पड़ा। जब नई प्रणाली ही मतदाता के अधिकार के विरुद्ध खड़ी हो जाए, तो डिजिटल सुधार किसके हित में किए जा रहे हैं? जनता के या सत्ता के?

विपक्ष का आरोप है कि प्रशासन और चुनाव आयोग की चुप्पी सुनियोजित चुनावी धांधली का प्रमाण है, जिसमें सत्ताधारी NDA को बढ़त दिलाने के लिए मतदाता अधिकारों को कुचला जा रहा है। उनका कहना है कि जहाँ भाजपा को नुकसान का डर है, वहाँ मशीनें खराब मिलती हैं और जहाँ वह मजबूत है, वहाँ मतदान सुचारू — यह संयोग नहीं, बल्कि सत्ता संचालित चुनाव मॉडल है। चुनाव आयोग पर “निष्पक्षता छोड़ने” का आरोप इसलिए भी गहरा हो रहा है क्योंकि शिकायतों पर त्वरित, प्रभावी और पारदर्शी कार्रवाई की कोई मिसाल आज सामने नहीं दिख रही।

नतीजा यह है कि पहले चरण के मतदान के बाद विपक्ष और मतदाता दोनों ही यह पूछने को मजबूर हैं कि क्या बिहार विधानसभा चुनाव वास्तव में चुनाव है भी, या सिर्फ सत्ता द्वारा लिखी गई स्क्रिप्ट का मंचन? यदि वोट डालने का अधिकार छीना जाए, यदि मशीनें एकतरफा काम करें, यदि शिकायतों को दबा दिया जाए, तो यह चुनाव नहीं — लोकतंत्र की खुली निर्मम हत्या है। ऐसे माहौल में परिणाम चाहे जो हों, जनता के मन में ये सवाल हमेशा जिंदा रहेंगे कि — क्या उनकी पसंद गिनी गई, या सत्ता की इच्छा ही आखिरकार जनता पर थोप दी गई?

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