एबीसी डेस्क 17 दिसंबर 2025
पटना: बिहार की राजनीति में एक बार फिर महिलाओं को लेकर बड़ा और विस्फोटक विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि चुनाव से पहले महिलाओं को ₹10,000 की राशि देकर वोट लिए गए और अब चुनाव खत्म होते ही उन्हीं महिलाओं को नोटिस भेजकर पैसे वापस मांगे जा रहे हैं। इस पूरे मामले ने राज्य में सरकार की नीयत, योजनाओं की पारदर्शिता और चुनावी नैतिकता पर सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले से जुड़े दावों के मुताबिक, राज्य के कई जिलों में महिलाओं को सरकारी योजनाओं के तहत ₹10,000 की सहायता राशि दी गई थी। उस समय इसे महिला सशक्तिकरण, राहत या सहायता योजना के तौर पर पेश किया गया। महिलाओं ने सरकार के भरोसे इस राशि को स्वीकार किया और चुनाव में सरकार को समर्थन भी दिया। लेकिन अब, चुनाव बीतते ही महिलाओं को नोटिस भेजे जा रहे हैं, जिनमें कहा जा रहा है कि यह राशि गलत तरीके से मिली है और इसे वापस किया जाए।
इस कथित कार्रवाई से सबसे ज्यादा असर गरीब, ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं पर पड़ा है। जिन महिलाओं ने यह पैसा रोजमर्रा की जरूरतों, बच्चों की पढ़ाई, इलाज या कर्ज चुकाने में खर्च कर दिया, उनके सामने अब पैसे लौटाने का दबाव है। सवाल उठ रहा है कि अगर राशि गलत तरीके से दी गई थी, तो चुनाव से पहले जांच क्यों नहीं हुई? और अगर यह सरकारी योजना थी, तो अब इसे वापस क्यों मांगा जा रहा है?
विपक्ष ने इस पूरे मामले को “चुनावी धोखाधड़ी और महिलाओं से ठगी” करार दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह पैसा जानबूझकर चुनाव से ठीक पहले बांटा गया, ताकि महिलाओं को प्रभावित किया जा सके। अब जब चुनाव खत्म हो गए, तो सरकार अपने हाथ खींच रही है और सारा बोझ आम महिलाओं पर डाल दिया गया है। इसे सरकारी संरक्षण में किया गया घोटाला बताया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। सरकारी योजनाओं का इस्तेमाल अगर वोट खरीदने के लिए किया गया और बाद में आम जनता से पैसे वसूले गए, तो यह बेहद गंभीर अपराध की श्रेणी में आएगा। इससे भविष्य में सरकारी योजनाओं पर लोगों का भरोसा भी पूरी तरह टूट सकता है।
फिलहाल, सरकार की ओर से इस मुद्दे पर स्पष्ट और ठोस जवाब सामने नहीं आया है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि नोटिस मिलने के बाद हजारों महिलाएं डरी हुई हैं और पूछ रही हैं — “अगर पैसा देना ही था, तो दिया क्यों गया?” और “अगर योजना थी, तो अब उसे घोटाला क्यों बताया जा रहा है?”
कुल मिलाकर, यह मामला अब केवल पैसे की वापसी का नहीं रह गया है। यह महिलाओं के सम्मान, भरोसे और अधिकार से जुड़ा सवाल बन चुका है। अगर समय रहते सरकार ने पारदर्शी जांच और स्पष्ट जवाब नहीं दिया, तो यह मुद्दा बिहार की राजनीति में नीतीश सरकार के लिए सबसे बड़ा नैतिक संकट बन सकता है।




