Home » National » मंदिर में पुजारी बनना अब किसी जाति की जागीर नहीं — केरल हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

मंदिर में पुजारी बनना अब किसी जाति की जागीर नहीं — केरल हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

कोच्चि 23 अक्टूबर 2025

केरल हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से क्रांतिकारी फैसला सुनाते हुए सदियों पुरानी जाति आधारित पुजारी परंपरा पर निर्णायक प्रहार किया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि “मंदिर के पुजारी का किसी विशेष जाति या वंश से होना कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) नहीं है।” यह फैसला न केवल मंदिर व्यवस्था के सामाजिक ढांचे को एक नई दिशा देता है, बल्कि धार्मिक कर्तव्यों के पालन में सामाजिक समानता को सुनिश्चित करता है।

न्यायमूर्ति अनिल के. नारायणन और सुधीर कुमार की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण निर्णय एक गैर-ब्राह्मण उम्मीदवार को पुजारी पद से वंचित किए जाने संबंधी याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने अपने स्पष्ट रुख में कहा कि हिंदू धर्म में किसी भी व्यक्ति की जाति या पारिवारिक वंश के आधार पर मंदिर में पूजा करने का अधिकार तय नहीं किया जा सकता, क्योंकि “धर्म की पवित्रता आस्था से तय होती है, न कि जन्म से।”

अदालत ने कहा कि यह जाति आधारित रोक संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है। संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के तहत किसी भी नागरिक को धार्मिक कर्तव्य निभाने से केवल जाति या वंश के आधार पर नहीं रोका जा सकता। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यदि कोई व्यक्ति योग्य है, आस्थावान है और धार्मिक अनुष्ठान करने की क्षमता रखता है, तो उसे सिर्फ इसलिए पुजारी बनने से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह किसी खास जाति या वंश से नहीं आता।

केरल की पृष्ठभूमि में यह फैसला अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ मंदिरों के पुजारी पद लंबे समय से ब्राह्मण परिवारों तक ही सीमित रहे हैं। इस फैसले से अब किसी भी समुदाय — चाहे वह दलित, पिछड़ा या अन्य समुदाय हो — के योग्य व्यक्तियों के लिए मंदिर में पुजारी बनने का रास्ता खुल गया है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और समाज सुधारकों ने इसे “आस्था और समानता के संगम” का फैसला बताया है। उनका कहना है कि यह निर्णय मनु-स्मृति के उस पुराने ढांचे को तोड़ता है, जिसने सदियों तक धर्म को जाति की दीवारों में बाँध दिया था।

यह फैसला भारत के सामाजिक न्याय के इतिहास में एक मील का पत्थर है, जो संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के इस विचार की पुनर्पुष्टि करता है कि धर्म का अर्थ दमन नहीं, बल्कि समानता और सेवा है। इस निर्णय से यह मिसाल कायम हुई है कि अब धार्मिक पवित्रता कर्म से तय होगी, न कि जन्म से, और इसका दूरगामी असर पूरे देश के मंदिर प्रशासन और धार्मिक अधिकारों के स्वरूप को बदल सकता है।

 

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments