महेंद्र कुमार । नई दिल्ली 17 दिसंबर 2025
लोकसभा में सतत परमाणु ऊर्जा के दोहन और भारत के रूपांतरण के लिए SHANTI (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India) बिल 2025 पर चर्चा के दौरान कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने इस बिल का विरोध करते हुए कहा कि यह कानून देश के नागरिक परमाणु क्षेत्र को निजी और संभावित रूप से विदेशी कंपनियों के लिए खोलने की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन इसके साथ जुड़ी जवाबदेही, सुरक्षा और नियामक निगरानी को लेकर सरकार पूरी तरह विफल दिख रही है।
मनीष तिवारी ने सदन में कहा कि सरकार इस बिल के जरिए नागरिक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी लाना चाहती है और यह चर्चा भी चल रही है कि इसमें 49 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत तक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) की अनुमति दी जा सकती है। उन्होंने इसे बेहद चौंकाने वाला बताते हुए कहा कि नवंबर में अडानी समूह द्वारा परमाणु क्षेत्र में उतरने की घोषणा के ठीक एक महीने के भीतर यह बिल संसद में पेश कर दिया गया। उनके मुताबिक, इस घटनाक्रम ने सरकार की मंशा और नीति-निर्माण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कांग्रेस नेता ने बिल की सबसे बड़ी खामी बताते हुए कहा कि इसमें सप्लायर लाइबिलिटी (आपूर्तिकर्ता की जवाबदेही) से जुड़ा एक भी स्पष्ट प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर, ईश्वर न करे, भविष्य में कोई परमाणु दुर्घटना या हादसा होता है और भारत विदेशी कंपनियों पर निर्भर होगा, तो फिर जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या भारत सिर्फ उपभोक्ता और पीड़ित बनकर रह जाएगा? मनीष तिवारी ने जोर देकर कहा कि सप्लायर को जिम्मेदार ठहराने का स्पष्ट कानून होना चाहिए, लेकिन यह बिल उस जिम्मेदारी को पूरी तरह हटाता नजर आता है।
उन्होंने एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (AERB) की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाए। तिवारी ने पूछा कि क्या AERB वास्तव में एक स्वायत्त और स्वतंत्र नियामक संस्था है या फिर वह सिर्फ परमाणु ऊर्जा विभाग (Department of Atomic Energy) का विस्तार मात्र है। उन्होंने कहा कि जब किसी क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला जाता है, तो वहां एक निष्पक्ष, स्वतंत्र और शक्तिशाली रेगुलेटर की जरूरत होती है, जो सरकार और कंपनियों—दोनों से बराबर दूरी बनाए रखे। मौजूदा ढांचे में यह भरोसा पैदा नहीं होता।
मनीष तिवारी ने रेडियोधर्मी कचरे (Radioactive Waste) के निपटान को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इस्तेमाल किया गया परमाणु ईंधन—जिसमें यूरेनियम और प्लूटोनियम शामिल होते हैं—हजारों वर्षों तक जहरीला बना रहता है। दुनिया के कई देश इसे उसी परमाणु संयंत्र की सुरक्षित सुविधाओं में लंबे समय तक स्टोर करते हैं। लेकिन SHANTI बिल में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि भारत में रेडियोधर्मी कचरे का सुरक्षित और दीर्घकालिक प्रबंधन कैसे किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इतने गंभीर विषय को सिर्फ नियमों और अधिसूचनाओं पर नहीं छोड़ा जा सकता; इसके लिए कानून में ही मजबूत ढांचा होना चाहिए।
अपने भाषण के अंत में मनीष तिवारी ने कहा कि परमाणु ऊर्जा कोई साधारण विषय नहीं है। इससे जुड़ा हर फैसला देश की सुरक्षा, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को प्रभावित करता है। इसलिए उन्होंने मांग की कि SHANTI बिल 2025 को जल्दबाजी में पास करने के बजाय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा जाए, ताकि इसके हर पहलू की गंभीर और विस्तृत जांच हो सके।
कुल मिलाकर, SHANTI बिल पर मनीष तिवारी का यह विरोध सरकार के लिए एक बड़ी चेतावनी माना जा रहा है। उनका कहना साफ है—न्यूक्लियर ऊर्जा विकास ज़रूरी हो सकती है, लेकिन बिना जवाबदेही, सुरक्षा और पारदर्शिता के यह विकास देश के लिए भारी जोखिम बन सकता है।




