अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/तेहरान | 19 मार्च 2026
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के बीच पेंटागन ने एक बड़ा और चौंकाने वाला कदम उठाया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग ने ईरान के खिलाफ चल रहे युद्ध को जारी रखने के लिए 200 अरब डॉलर (लगभग 16 लाख करोड़ रुपये) की अतिरिक्त राशि की मांग की है।
यह मांग ऐसे समय आई है जब युद्ध की लागत तेजी से बढ़ रही है और अमेरिकी खजाने पर भारी दबाव पड़ रहा है। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ पहले हफ्ते में ही अमेरिका करीब 11 अरब डॉलर खर्च कर चुका है, जिससे साफ है कि यह संघर्ष लंबा और महंगा साबित हो सकता है।
कितना बड़ा है यह आंकड़ा?
आर्थिक नजरिए से देखें तो 200 अरब डॉलर की यह राशि बेहद बड़ी है। अनुमान के अनुसार, ईरान की कुल GDP (सकल घरेलू उत्पाद) लगभग 400 से 450 अरब डॉलर के बीच मानी जाती है। ऐसे में पेंटागन की यह मांग ईरान की GDP का लगभग 45% से 50% तक बैठती है।
यानी अमेरिका जितना पैसा सिर्फ युद्ध पर खर्च करना चाहता है, वह ईरान की पूरी सालाना अर्थव्यवस्था के लगभग आधे के बराबर है। यही वजह है कि इस आंकड़े को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा तेज हो गई है।
अमेरिका में भी उठ रहे सवाल
इस भारी-भरकम फंडिंग प्रस्ताव को लेकर अमेरिकी राजनीति में भी मतभेद साफ नजर आ रहे हैं। कांग्रेस में कई नेता इस युद्ध की लागत, रणनीति और दीर्घकालिक असर पर सवाल उठा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह प्रस्ताव मंजूर होता है, तो यह अमेरिका के रक्षा खर्च में बड़ा उछाल होगा और इसका असर आम नागरिकों पर भी पड़ सकता है—महंगाई, टैक्स और आर्थिक प्राथमिकताओं के रूप में।
युद्ध का बढ़ता दायरा और असर
ईरान युद्ध अब सिर्फ सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रहा है। इसका असर वैश्विक तेल बाजार, ऊर्जा आपूर्ति और मध्य-पूर्व की स्थिरता पर भी साफ दिख रहा है। तेल की कीमतों में उछाल और क्षेत्रीय तनाव इस संघर्ष को और जटिल बना रहे हैं।
पेंटागन की 200 अरब डॉलर की मांग सिर्फ एक बजट प्रस्ताव नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि अमेरिका इस युद्ध को लंबी रणनीति के तहत देख रहा है। लेकिन सवाल यही है—क्या इतनी भारी कीमत चुकाकर भी स्थायी समाधान संभव होगा, या यह संघर्ष दुनिया को और गहरे संकट में धकेल देगा?




